विस्तृत उत्तर
महाप्रलय के समय जीवों के कर्म-संस्कार नष्ट नहीं होते। वे सूक्ष्म और अव्यक्त रूप में भगवान विष्णु के भीतर सुरक्षित रहते हैं।
योगनिद्रा में जीवों के कर्म कहाँ जाते हैं को संदर्भ सहित समझें
योगनिद्रा में जीवों के कर्म कहाँ जाते हैं का सबसे सीधा सार यह है: वे विष्णु के भीतर अव्यक्त संस्कार रूप में सुरक्षित रहते हैं।
लोक जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.
इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।
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इसी विषय के 5 प्रश्न
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भूलोक को 'महा-रंगमंच' क्यों कहा गया है?
भूलोक 'महा-रंगमंच' इसलिए है क्योंकि यहाँ अनगिनत जीवात्माएं अपने कर्मों का नाटक खेलती हैं। देवता भी यहाँ जन्म चाहते हैं क्योंकि केवल यहीं मोक्ष का मार्ग है।
गरुड़ पुराण के अनुसार भूलोक में किए कर्मों का परलोक से क्या संबंध है?
गरुड़ पुराण के अनुसार भूलोक में किए गए कर्म ही परलोक की यात्रा तय करते हैं। पाप से नर्क, पुण्य से स्वर्ग। भोग के बाद पुनः भूलोक में जन्म होता है।
भूलोक का संबंध मृत्यु के बाद की यात्रा से क्या है?
मृत्यु के बाद भूलोक में किए कर्मों के अनुसार स्वर्ग-नरक मिलता है लेकिन वहाँ का भोग पूरा होने पर पुनः भूलोक में ही लौटना पड़ता है। यहीं जन्म-मरण का चक्र तोड़ा जा सकता है।
पापी आत्मा मृत्यु के बाद भुवर्लोक में क्यों फंस जाती है?
अत्यधिक पाप कर्म, भौतिक आसक्ति या अकाल मृत्यु के कारण आत्मा सीधे स्वर्ग-नरक नहीं जा पाती और प्रेत योनि में निचले भुवर्लोक में फंस जाती है।
भगवान नाराज हों तो क्या लक्षण दिखते हैं?
भगवान मनुष्यों की तरह नाराज नहीं होते। किंतु जब हम उनसे दूर जाते हैं तो — पूजा में मन न लगना, भीतरी बेचैनी, सत्संग से विरक्ति महसूस होती है। यह 'नाराजगी' नहीं, हमारे कर्म और मन का प्रतिबिंब है। पश्चाताप और वापसी का रास्ता हमेशा खुला है।
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