विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत पुराण (२.१.२८) में महर्लोक को विराट् पुरुष की ग्रीवा (गर्दन) बताने का गूढ़ अर्थ अत्यंत रहस्यमयी और बहुस्तरीय है। शास्त्रों का यह तादात्म्य अत्यंत गूढ़ और रहस्यमयी है। जिस प्रकार मानव शरीर में गर्दन (ग्रीवा) धड़ (निचले भौतिक अंगों) और सिर (उच्चतम वैचारिक और चेतनात्मक अंगों) को जोड़ने का एक महत्वपूर्ण सेतु है ठीक उसी प्रकार ब्रह्माण्ड में महर्लोक विनाशशील त्रैलोक्य और नित्य-अविनाशी लोकों के बीच एक सशक्त आध्यात्मिक सेतु का कार्य करता है। गरुड़ पुराण के सूक्ष्म शरीर-विज्ञान के अनुसार जब कोई साधक ध्यान और योग की प्रक्रिया में संलग्न होता है तो महर्लोक का स्थान कण्ठ (Throat) के क्षेत्र में माना गया है। योगशास्त्र में यह विशुद्ध चक्र का स्थान है जो सत्य, पवित्रता और उच्चतर पारमार्थिक चेतना का मुख्य द्वार माना जाता है। इसी कारण महर्लोक में जाने वाले सिद्ध जीव अपनी चेतना को कण्ठ से ऊपर की ओर ले जाते हैं जहाँ अज्ञान और भौतिक प्रलोभनों का पूर्णतः शमन हो जाता है।
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