विस्तृत उत्तर
भगवान के एक होकर भी अनेक-से दिखाई देने की व्याख्या सुंदर उदाहरण से की गई है। भगवान वास्तव में पूर्ण विज्ञानानंदघन हैं और सत्त्व, रज, तम जैसे गुण उनकी माया के विलास हैं। वे गुणों में रहते हुए भी उनसे युक्त-से दिखाई देते हैं, पर वास्तव में उनसे बंधे नहीं हैं। जैसे अग्नि एक ही होती है, लेकिन अलग-अलग प्रकार की लकड़ियों में प्रकट होकर अनेक-सी दिखाई देती है, वैसे ही सबके आत्मरूप भगवान एक ही हैं, पर प्राणियों की अनेकता से अनेक-जैसे जान पड़ते हैं। वही भगवान सूक्ष्म भूत, इंद्रिय, अंतःकरण आदि के द्वारा नाना योनियों का निर्माण करते हैं, उनमें जीवों के रूप में प्रवेश करते हैं और देवता, पशु-पक्षी, मनुष्य आदि योनियों में लीलावतार लेकर जीवों का पालन करते हैं।
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