विस्तृत उत्तर
माया और अविद्या के हटने पर जीव की स्थिति बताई गई है। स्थूल और सूक्ष्म शरीर अविद्या से आत्मा में आरोपित बताए गए हैं। जिस अवस्था में आत्मस्वरूप के ज्ञान से यह आरोप दूर हो जाता है, उसी समय ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। आगे कहा गया है कि तत्त्वज्ञानी जानते हैं कि जब यह बुद्धिरूपा परमेश्वर की माया निवृत्त हो जाती है, तब जीव परमानंदमय हो जाता है और अपनी स्वरूप-महिमा में स्थित होता है। इसलिए माया दूर होने का अर्थ केवल भ्रम हटना नहीं, बल्कि आत्मा पर चढ़े हुए झूठे स्थूल-सूक्ष्म आरोप का मिटना है। उसके बाद जीव अपने वास्तविक आनंदस्वरूप और ब्रह्म-संबंध का अनुभव करता है।
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