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विस्तृत उत्तर
मन को उभयात्मक कहा गया है और उसे पाँच ज्ञानेन्द्रियों तथा पाँच कर्मेन्द्रियों के साथ जीव के लिए बनाया गया बताया गया है। प्रसंग शब्द, स्पर्श आदि को ग्रहण करने से जुड़ा है। उपलब्ध वर्णन मन को दोनों पक्षों से संबंधित बताता है, पर इसकी अलग विस्तृत व्याख्या नहीं देता। इसलिए उत्तर को इन्द्रियों और ग्रहण-कार्य के संदर्भ तक सीमित रखना चाहिए।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 3, PDF पृष्ठ 23, श्लोक 27
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