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जीव और इन्द्रियाँ📜 श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 3, PDF पृष्ठ 23, श्लोक 27⏱ 1 मिनट पठन

मन को उभयात्मक क्यों कहा गया है?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

मन को पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों के साथ जीव के लिए उभयात्मक बताया गया है।

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विस्तृत उत्तर

मन को उभयात्मक कहा गया है और उसे पाँच ज्ञानेन्द्रियों तथा पाँच कर्मेन्द्रियों के साथ जीव के लिए बनाया गया बताया गया है। प्रसंग शब्द, स्पर्श आदि को ग्रहण करने से जुड़ा है। उपलब्ध वर्णन मन को दोनों पक्षों से संबंधित बताता है, पर इसकी अलग विस्तृत व्याख्या नहीं देता। इसलिए उत्तर को इन्द्रियों और ग्रहण-कार्य के संदर्भ तक सीमित रखना चाहिए।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 3, PDF पृष्ठ 23, श्लोक 27
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

मन को उभयात्मक क्यों कहा गया है को संदर्भ सहित समझें

मन को उभयात्मक क्यों कहा गया है का सबसे सीधा सार यह है: मन को पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों के साथ जीव के लिए उभयात्मक बताया गया है।

जीव और इन्द्रियाँ जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 3, PDF पृष्ठ 23, श्लोक 27 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 3, PDF पृष्ठ 23, श्लोक 27 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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जीव और इन्द्रियाँ श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।

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यदि विस्तृत विधि या पृष्ठभूमि चाहिए, तो नीचे दिए गए लेख पहले खोलें।

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