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विस्तृत उत्तर
पृथ्वी में पाँच गुण बताए गए हैं क्योंकि वह शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध से युक्त है। भूतसर्ग में प्रत्येक आगे का तत्व अपने पूर्व गुणों को साथ लेकर चलता है। जल पृथ्वी को आच्छादित करता है और पृथ्वी गन्धतन्मात्रावाली कही गई है। इस क्रम में पृथ्वी पाँचों गुणों से युक्त, जल चार गुणों से, अग्नि तीन गुणों से, वायु दो गुणों से और आकाश एक गुण से युक्त बताया गया है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 3, PDF पृष्ठ 23, श्लोक 22-25
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