अरण्यकाण्ड भाग 7 – सुतीक्ष्ण मुनि से भेंट एवं राक्षस-विनाश का संकल्प
पिछले भाग का संक्षिप्त सार
अरण्य काण्ड भाग 6 में हम देख चुके हैं कि भगवान श्रीराम ने दण्डकारण्य (दंडक वन) में राक्षस विराध का वध किया और तपस्वी शरभंग ऋषि को ब्रह्मलोक गति प्राप्त हुई। इन घटनाओं के बाद श्रीराम, माता सीता एवं लक्ष्मण आगे वन में ऋषि-मुनियों के आश्रमों की ओर बढ़ते हैं।
इस भाग 7 में हम सुतीक्ष्ण मुनि से प्रभु श्रीराम की भेंट, उनकी भावपूर्ण भक्ति, तथा महर्षि अगस्त्य के आश्रम में आगमन एवं श्रीराम द्वारा दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्राप्ति की कथा विस्तार से समझेंगे। चलिए, अरण्य काण्ड की पवित्र कथा को आगे बढ़ाते हैं।
सुतीक्ष्ण मुनि का आश्रम और प्रभु आगमन
शरभंग ऋषि के परमधाम गमन के पश्चात श्रीराम ने देखा कि दण्डकवन के ऋषि-मुनि राक्षसों द्वारा अत्याचार से पीड़ित हैं। करुणानिधान प्रभु ने वहीं संकल्प लिया कि वे धरती को निशाचरों (राक्षसों) के भय से मुक्त करेंगे:
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥९॥
भावार्थ: श्री रामजी ने भुजा उठाकर प्रण किया – “मैं पृथ्वी को निशाचरों (राक्षसों) से हीन कर दूँगा (मुक्त कर दूँगा)।” इसके बाद भगवान सब मुनियों के आश्रमों में एक-एक करके गए और अपने दर्शन व संवाद से उन्हें आनंद प्रदान किया।
इसी क्रम में भगवान श्रीराम, अनुज लक्ष्मण एवं सीता जी सहित अगस्त्य मुनि के प्रिय शिष्य सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम पहुँचे। सुतीक्ष्ण ऋषि एक अत्यंत ज्ञानवान तथा परम भक्त साधु थे। तुलसीदास जी उनका परिचय कराते हुए कहते हैं:
मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक॥१॥
भावार्थ: मुनि अगस्त्य के एक सुजान (ज्ञानी) शिष्य थे जिनका नाम सुतीक्ष्ण था और जिनकी भगवान में प्रगाढ़ प्रीति थी। वे मन, कर्म और वचन से सदा श्रीरामजी के चरणों की सेवा करने वाले थे। उन्हें स्वप्न में भी किसी अन्य देवता का भरोसा नहीं था, अर्थात् उनकी एकनिष्ठ भक्ति केवल श्रीराम के प्रति थी।
भगवान के आगमन का समाचार मिलते ही सुतीक्ष्ण मुनि का हृदय हर्ष से भर गया। प्रभु दर्शन की अधीरता में वे तुरंत आश्रम से निकल पड़े। उनके रोम-रोम में प्रेम की ऐसी उछाह थी कि रास्ता भूलकर वे इधर-उधर दौड़ने लगे।
कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई॥६॥
भावार्थ: अत्यंत प्रेमोन्मत्त हो चुके उस ज्ञानी मुनि को अब दिशाएं और मार्ग कुछ भी सूझ नहीं रहे थे। ‘मैं कौन हूँ, कहाँ जा रहा हूँ?’ – यह भी ज्ञान नहीं रहा। वे कभी पीछे मुड़कर फिर आगे चलने लगते, तो कभी प्रभु के गुण गाते हुए नृत्य करने लगते थे।
सुतीक्ष्ण जी मन ही मन विचार कर रहे थे कि “क्या दीनबन्धु श्रीरघुनाथ मेरे जैसे दीन पर कृपा करेंगे? क्या प्रभु लक्ष्मण सहित अपने इस सेवक से मिलेंगे?” प्रभु के प्रति अपनी न्यूनता का स्मरण कर उनकी आँखों से प्रेमाश्रु बह रहे थे। उनके मन में एक ही भरोसा था – भगवान करुणानिधान हैं और जिन्हें संसार में किसी दूसरे का आश्रय नहीं, उन्हें वे अपने सेवक के रूप में अपनाते हैं। इस एकमात्र आस ने मुनि के हृदय में अनन्य प्रेम की धारा प्रवाहित कर दी थी।
श्रीराम–सुतीक्ष्ण मिलन: प्रेम की पराकाष्ठा
भगवान राम ने छिपकर (वृक्ष की ओट में) प्रेम-विभोर मुनि की दशा देखनी चाही। प्रभु की लीला भी निराली थी – सुतीक्ष्ण जी प्रेम के अतिरेक में सुध-बुध खो बैठे और उनके हृदय में साक्षात श्रीराम चतुर्भुज स्वरूप में प्रकट हो गए।
प्रभु के इस अंतर्मुख दर्शन से मुनि का रोम-रोम पुलकित हो उठा और वे रास्ते के बीच ही आनंद-विभोर हो अचल होकर बैठ गए। कुछ क्षण बाद भगवान ने अपना अंतरध्यान चतुर्भुज रूप छिपा लिया। इष्ट स्वरूप ओझल होते ही सुतीक्ष्ण जी व्याकुल होकर ऐसे उठे मानो मणि के बिना सर्प व्याकुल हो जाता है। सामने दृष्टि पड़ते ही उन्होंने साक्षात सीता-लक्ष्मण सहित श्यामसुंदर राम को खड़े देखा।
भगवान को प्रत्यक्ष देखकर परम भाग्यशाली मुनि प्रेमावेश में डूबकर मानो लकड़ी की भाँति श्रीराम के चरणों पर गिर पड़े:
भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई॥११॥
भावार्थ: मुनि श्रीराम के चरणों में इस प्रकार गिर पड़े जैसे कोई लकड़ी हो – चेतना हीन, भाव में लीन। वे प्रेम में पूरी तरह मग्न हो गए थे। भगवान राम ने उन्हें अपनी विशाल भुजाओं से उठाकर अपने वक्षस्थल से लगाकर परम स्नेह प्रदान किया।
भावार्थ: प्रेम में मग्न हुए वह महान भाग्यशाली श्रेष्ठ मुनि लाठी के समान गिरकर श्रीरामजी के चरणों में लग गए। तब कृपालु श्रीराम ने अपनी बलवान भुजाओं से पकड़कर उन्हें उठा लिया और बड़ी प्रीति से हृदय से लगा लिया।
भगवान और भक्त का यह मिलन अति मंगलमय था। तुलसीदास जी इस दृश्य की अद्भुत झलक देते हैं – सुतीक्ष्ण मुनि और कृपालु राम के मिलन को देखकर ऐसा जान पड़ता है मानो सोने के वृक्ष (सुतीक्ष्ण के तपस्वी स्वर्णिम तेज) से तमाल (श्यामवर्ण राम) का वृक्ष गले लग रहा हो। मुनि स्तब्ध खड़े प्रभु के मुखारविंद को निहार रहे हैं, मानो किसी चित्र में अंकित हों।
कुछ समय बाद मुनि सुतीक्ष्ण ने अपने को संयत किया और बार-बार श्रीराम के चरण स्पर्श कर उन्हें अपने आश्रम में ले आए। वहाँ उन्होंने आदरपूर्वक विविध प्रकार से प्रभु की पूजा-अर्चना की:
निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार॥१०॥
भावार्थ: फिर मुनि सुतीक्ष्ण ने हृदय में धीरज धरकर बार-बार श्रीराम के चरण पकड़े। अपने आश्रम में प्रभु को लाकर उन्होंने विविध प्रकार से उनकी पूजा की। मुनि को ऐसी भावना हुई कि आज उनके जैसा भाग्यवान कोई नहीं है, जो स्वयं रामचंद्र उनके आतिथ्य को स्वीकार करने पधारे हैं।
सुतीक्ष्ण द्वारा प्रभु स्तुति और वरदान
पूजन के उपरांत भावविभोर सुतीक्ष्ण ऋषि ने विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर कहा, “हे प्रभु! मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? आपकी महिमा अनंत है और मेरी बुद्धि अल्प है, जैसे सूर्य के सामने जुगनू का प्रकाश!” इस विनय के साथ मुनि ने श्रीराम के दिव्य स्वरूप की स्तुति करनी प्रारंभ की।
सुतीक्ष्णजी की स्तुति के कुछ अंश संस्कृतमिश्रित चौपाइयों में हैं, जो भगवान के गुणों की अत्यंत सुंदर उपमा प्रस्तुत करते हैं। उदाहरणस्वरूप वे कहते हैं – हे प्रभु! आप मोह रूपी घने अंधकारवन को भस्म कर देने वाली अग्नि हैं, संतों रूपी कमलों को प्रफुल्लित करने वाले सूर्य हैं, राक्षस रूपी हाथियों के समूह को परास्त करने वाले सिंह हैं, तथा जन्म-मृत्यु रूपी पक्षी (भव रूपी खग) को मारने के लिए बाज (गरुड़) स्वरूप हैं।
आपके बड़े-बड़े लाल कमल जैसे नेत्र हैं, जटाजूट मुकुट है, मुनि-वेष में किंतु कर में धनुष-बाण और कटि पर तूणीर धारण किए हैं – ऐसे श्याम शरीर वाले रघुवीर को मैं निरंतर नमन करता हूँ।
आप ज्ञान, वाणी और इंद्रियों से परे निर्गुण-ब्रह्म भी हैं और लीलामय सगुण रूप भी, कलियुग के महान पापों का नाश करने वाला आपका नाम है, भक्तों के लिए आप कल्पवृक्ष के उद्यान हैं और संसार-सागर से पार होने के लिए सेतु (पुल) हैं। इस प्रकार मुनि ने विविध स्तुतियों से प्रभु को प्रसन्न किया।
भगवान ने प्रसन्न होकर वर मांगने को कहा। सुतीक्ष्ण मुनि अत्यंत विनम्र थे। उन्होंने कहा कि “मैंने कभी कुछ वर माँगा ही नहीं, मुझे तो यह भी समझ नहीं पड़ता कि क्या सत्य है, क्या असत्य। प्रभु मुझे वही दें जो मुझे वास्तविक कल्याण दे।” उनकी विनीत भावना को जानकर श्रीराम ने उन्हें दृढ़ भक्ति, वैराग्य (वितृष्णा), अध्यात्म ज्ञान तथा समस्त सद्गुणों का आशीर्वाद दिया।
यह वर पाकर भी मुनि के मन में एक और प्रार्थना थी – उन्होंने प्रभु से निवेदन किया कि मेरी सबसे बड़ी इच्छा तो बस यही है:
मन हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निःकाम॥११॥
भावार्थ: हे प्रभो! लक्ष्मण तथा जानकी सहित धनुष-बाणधारी श्रीरामजी, आप निरंतर निष्काम भाव से मेरे मन रूपी आकाश में चंद्रमा की तरह विराजमान रहें।
इस प्रकार सुतीक्ष्ण जी ने स्वयं को परम सेवक और श्रीराम को स्वामी मानते हुए यह अनन्य भक्ति का वर मांगा। उन्होंने प्रार्थना की कि यह भाव जीवन भर कभी भी न छोड़े कि “मैं तो सेवक हूँ और रघुनाथजी मेरे परम स्वामी हैं।” उनकी यह विनय सुनकर श्रीराम ने अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें हृदय से लगा लिया।
भक्त और भगवान के इस संवाद ने यह शिक्षा दी कि भक्त का सबसे बड़ा सुख प्रभु के चरणों में अक्षय प्रेम ही है, और प्रभु अपने भक्तों को यही वरदान सर्वोपरि देते हैं।
सुतीक्ष्ण मुनि ने प्रभु से “अपने गुरु अगस्त्य से मिलाने” का कोई आग्रह प्रत्यक्ष नहीं किया, किंतु उनके मन में गुरु-दर्शन की अभिलाषा अवश्य थी। इतने में श्रीरामचंद्रजी ने कहा कि “तात (सुतीक्ष्ण)! आपसे कुछ भी छिपा नहीं है। मैं किस कारण से वन में आया हूँ, यह आप जानते हैं। इसीलिए अलग से समझाकर कहने की आवश्यकता नहीं समझी।” दरअसल भगवान संकेत कर रहे थे कि वे धरती से राक्षसों का संहार करने हेतु वनवासी बने हैं और इसमें ऋषि-मुनियों का मार्गदर्शन चाहते हैं।
सुतीक्ष्ण जी समझ गए कि श्रीराम अब अगस्त्य मुनि से मिलने चलेंगे। उन्होंने विनोदपूर्वक प्रभु से साथ चलने की अनुमति माँगी – “प्रभु! अब मैं भी आपके साथ गुरु आश्रम चलूँ? इसमें आपका कोई एहसान न होगा, मुझे भी बहुत दिनों से गुरुदेव के दर्शन नहीं हुए।” उनकी चतुर भक्ति-भरी विनती पर करुणानिधान श्रीराम मुस्कुराए और सहर्ष उन्हें साथ ले लिया।
इस प्रकार सुतीक्ष्ण मुनि अपने आराध्य श्रीराम को लेकर अपने गुरु महर्षि अगस्त्य के आश्रम की ओर चल पड़े। मार्ग भर भगवान राम सुतीक्ष्ण जी से प्रेमपूर्वक चर्चा करते रहे। उन्होंने स्नेहवश मुनि से उनकी अनुपम भक्ति के बारे में प्रश्न किए और प्रसन्न होकर उनकी प्रशंसा भी की।
उधर, अगस्त्य मुनि के आश्रम के निकट पहुँचकर सुतीक्ष्ण जी पहले आगे बढ़े और गुरु के चरणों में दण्डवत प्रणाम कर विनम्रतापूर्वक आगमन की सूचना दी। इस हर्ष और श्रद्धा से भरे प्रसंग को हम आगे के भाग में विस्तार से समझेंगे।






