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विस्तृत उत्तर
वाराणसी माहात्म्य को क्षेत्रमाहात्म्य आदि विषयों के साथ रखा गया है। उसी क्रम में मेघवाहन कल्प का वृत्तान्त, रुद्रगरिमा, ऋषियों के मध्य शिवलिङ्ग का उद्भव, लिङ्ग की उपासना-स्नानविधि और शौचाचार का लक्षण भी वर्णित बताए गए हैं। इसलिए वाराणसी का महत्त्व तीर्थ और क्षेत्र-माहात्म्य वाले विषयों के साथ आता है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 2, PDF पृष्ठ 17, श्लोक 16-17
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