विस्तृत उत्तर
इलावृत वर्ष जम्बूद्वीप का बिल्कुल मध्य भाग है जहाँ सुमेरु पर्वत स्थित है। श्रीमद्भागवत के अनुसार इस वर्ष में साक्षात् भगवान शिव ही एकमात्र पुरुष हैं। भगवान शिव यहाँ करोड़ों दासियों से घिरे रहते हैं और वे स्वयं चतुर्व्यूह के चतुर्थ अंश 'संकर्षण' की अत्यंत भावपूर्ण स्तुति और उपासना करते हैं। भगवान संकर्षण यद्यपि तमोगुणी संहारक रूप माने जाते हैं किन्तु उनका मूल स्वरूप विशुद्ध सत्वमय है। इलावृत वर्ष में शिव जी द्वारा संकर्षण की उपासना का गहरा तात्विक अर्थ है — शिव जो स्वयं संहारक हैं वे संहारशक्ति के मूल स्रोत संकर्षण का ध्यान करके अपनी शक्ति का उद्गम उस परम सत्ता में देखते हैं। यह इस बात का भी संकेत है कि देवों के देव महादेव भी भगवान विष्णु के चतुर्व्यूह स्वरूप के उपासक हैं जो वैष्णव दर्शन और शैव दर्शन के अद्भुत समन्वय को दर्शाता है।
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