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धर्म और आचार📜 श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 58, श्लोक 17⏱ 1 मिनट पठन

सत्य बोलने का सही अर्थ क्या है?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

पूछे जाने पर देखे गए कथनयोग्य और अकथनीय विषय को बिना छिपाए व्यक्त करना सत्य कहा गया है।

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विस्तृत उत्तर

सत्य बोलने का अर्थ पूछे जाने पर देखे गए विषय को बिना छिपाए व्यक्त करना बताया गया है। पाठ में कथनयोग्य और कथन के अयोग्य दोनों प्रकार के विषय का उल्लेख है, और कहा गया है कि उसे बिना छिपाए अभिव्यक्त करना सत्य है। यह सत्य की ऐसी परिभाषा है जिसमें छिपाव नहीं है और कथन यथार्थ के आधार पर है। इसलिए सत्य वाणी का सम्बन्ध सीधे और निष्कपट अभिव्यक्ति से है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 58, श्लोक 17
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

सत्य बोलने का सही अर्थ क्या है को संदर्भ सहित समझें

सत्य बोलने का सही अर्थ क्या है का सबसे सीधा सार यह है: पूछे जाने पर देखे गए कथनयोग्य और अकथनीय विषय को बिना छिपाए व्यक्त करना सत्य कहा गया है।

धर्म और आचार जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 58, श्लोक 17 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 58, श्लोक 17 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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