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विस्तृत उत्तर
कर्ण, इंद्र के छल को पहचानने के बावजूद, अपने जीवन से अधिक अपने वचन को महत्व दिया। उसने अपने प्राणों की चिंता किए बिना अपने 'दानवीर' होने के धर्म का पालन करने का निर्णय लिया। यह दृश्य अत्यंत मार्मिक था जब कर्ण ने अपने शरीर का हिस्सा रहे कवच और कुंडल को अपने रक्त से लथपथ होते हुए काटकर उस ब्राह्मण वेशधारी इंद्र को सौंप दिया। कर्ण के लिए अपना दानवीर धर्म अपने प्राणों से भी अधिक महत्वपूर्ण था।
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