विस्तृत उत्तर
दिव्यास्त्र अपनी असीम शक्ति और विनाशकारी क्षमता के कारण मनमाने ढंग से प्रयोग किए जाने वाले हथियार नहीं थे। इनके प्रयोग के चार प्रमुख नैतिक नियम थे। पहला, अंतिम उपाय — दिव्यास्त्रों का प्रयोग सामान्यतः तब किया जाता था जब शत्रु को परास्त करने के अन्य सभी साधन विफल हो चुके हों। दूसरा, धर्म की रक्षा — इनका मुख्य उद्देश्य धर्म की रक्षा करना, निर्दोषों को बचाना और आसुरी शक्तियों का विनाश करना होता था। तीसरा, अकारण प्रयोग का निषेध — कमजोर, निःशस्त्र, शरणागत या युद्ध से विमुख शत्रु पर दिव्यास्त्र का प्रयोग अधर्म माना जाता था। चौथा, नियंत्रण का ज्ञान — अस्त्र चलाने के साथ उसे वापस लेने का ज्ञान भी अत्यंत महत्वपूर्ण था।
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