विस्तृत उत्तर
कुरुक्षेत्र युद्ध के उत्तरार्ध में अपने पिता द्रोणाचार्य की छलपूर्ण मृत्यु से क्रोधित और प्रतिशोध की अग्नि में जलते हुए अश्वत्थामा ने पांडव सेना का समूल नाश करने के उद्देश्य से नारायणास्त्र का आह्वान किया। यह प्रतिशोध और क्रोध में लिया गया एक विनाशकारी निर्णय था। द्रोणाचार्य की मृत्यु के बाद अश्वत्थामा का उद्देश्य था कि वह पांडव पक्ष को पूरी तरह समाप्त कर दे। इसीलिए उसने अपना सबसे शक्तिशाली अस्त्र नारायणास्त्र चलाया।
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