विस्तृत उत्तर
महाभारत के महानायक अर्जुन को वायव्यास्त्र का ज्ञान दो प्रमुख स्रोतों से प्राप्त हुआ था। पहले उन्होंने अपने गुरु द्रोणाचार्य से अन्य दिव्यास्त्रों के साथ इसकी शिक्षा प्राप्त की। दूसरे अपने वनवास काल में उन्होंने देवलोक जाकर स्वयं पवन देव की आराधना की और उनसे प्रत्यक्ष रूप से वायव्यास्त्र की दीक्षा प्राप्त की। यह अर्जुन की असाधारण धनुर्विद्या और दिव्यास्त्रों पर उनके अधिकार को प्रमाणित करता है, साथ ही गुरु-शिष्य परंपरा और देव-कृपा दोनों के महत्व को भी रेखांकित करता है।
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