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विस्तृत उत्तर
नारायणास्त्र का प्रयोग एक युद्ध में या संभवतः पूरे जीवनकाल में केवल एक बार ही किया जा सकता था। यह नियम इसके अंधाधुंध प्रयोग को रोकने के लिए था और यह सुनिश्चित करता था कि योद्धा इसे केवल अत्यंत संकटपूर्ण और अंतिम उपाय के रूप में ही प्रयोग करे। यह नियम अस्त्र के धारक पर एक बहुत बड़ी नैतिक जिम्मेदारी डालता था कि वह इसका प्रयोग अत्यंत विवेक और सावधानी से करे। इसीलिए पौराणिक कथाओं में इसके प्रयोग के उदाहरण अत्यंत सीमित हैं।
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