अगस्त्य मुनि से भेंट एवं आश्रम का दिव्य वातावरण
इस प्रकार सुतीक्ष्ण मुनि अपने आराध्य श्रीराम को लेकर अपने गुरु महर्षि अगस्त्य के आश्रम की ओर चल पड़े। मार्ग भर भगवान राम सुतीक्ष्ण जी से प्रेमपूर्वक चर्चा करते रहे। उन्होंने स्नेहवश मुनि से उनकी अनुपम भक्ति के बारे में प्रश्न किए और प्रसन्न होकर उनकी प्रशंसा भी की।
उधर अगस्त्य मुनि के आश्रम के निकट पहुँचकर सुतीक्ष्ण जी पहले आगे बढ़े और गुरु के चरणों में दण्डवत प्रणाम कर विनम्र सूचना दी:
राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही॥४॥
भावार्थ: “हे नाथ! अयोध्या के स्वामी दशरथ के पुत्र, जगत के आधार श्रीरामचंद्र अपने अनुज लक्ष्मण जी तथा वैदेही सीता जी सहित आपसे मिलने पधारे हैं – वही श्रीराम जिनका प्रभो! आप रात-दिन जप करते हैं।”
यह सुनते ही महान योगी महर्षि अगस्त्य अतिउत्साह से तुरंत उठ दौड़े। जिस प्रभु का नाम जपते उनका जीवन बीत रहा था, वही नारायण साक्षात सामने आ गए! अपने आराध्य श्रीहरि को देखते ही ऋषि अगस्त्य के नेत्रों में प्रेमाश्रु छलक पड़े:
मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई॥५॥
भावार्थ: यह सुनते ही अगस्त्यजी तुरंत उठकर दौड़े। भगवान श्रीहरि को अपनी कुटिया में आते देखकर प्रेम के आँसू उनके नेत्रों में भर आए। उधर श्रीराम एवं लक्ष्मण दौड़कर मुनि के कमल समान चरणों पर गिर पड़े। ऋषि ने अत्यंत प्रेम से दोनों भाइयों को उठा कर हृदय से लगा लिया।
महर्षि अगस्त्य ने प्रेमाभिभूत हो प्रभु राम, सीता और लक्ष्मण का सादर कुशल-क्षेम पूछा और आसन अर्पित कर आदरपूर्वक बैठाया। फिर विविध प्रकार से विधि-विधान से पूजन कर कहा, “आज मेरे समान भाग्यवान् कोई नहीं, जो साक्षात आनंदकंद प्रभु मेरे आश्रम पधारे हैं!” जितने भी अन्य तपस्वी मुनि आश्रम में थे, सभी भगवान की मनोहर मूर्ति देखकर हर्षित हो गए।
श्रीराम उन सभी मुनियों के बीच ऐसे सुशोभित हो बैठे, मानो शरद पूर्णिमा के चंद्रमा के चारों ओर चकोर पक्षियों का समूह टकटकी लगाए निहार रहा हो।
श्रीराम और अगस्त्य मुनि संवाद
पूरी विनम्रता के साथ भगवान राम ने मुनि अगस्त्य के समक्ष अपनी बात रखी। वे जानते थे कि ऋषि सभी भेद जानने में समर्थ हैं, फिर भी धर्म मर्यादा के अनुसार उन्होंने गुरुवत अगस्त्य से मार्गदर्शन माँगा:
तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ॥१॥
भावार्थ: तब श्री रघुवीर ने मुनि से कहा – “हे प्रभो! आपसे तो कुछ भी छिपा नहीं है। किस कारण से मैं (वन में) आया हूँ, यह आप भलीभांति जानते हैं। इसीसे, हे तात! मैंने आपको अलग से विस्तारपूर्वक कुछ नहीं बताया है।”
श्रीराम आगे विनीत होकर निवेदन करते हैं कि “अब आप कृपा करके वह उपाय (मंत्र) बताइये जिससे मैं इन मुनिद्रोही राक्षसों का संहार करूँ।” प्रभु की यह आज्ञा-सदृश प्रार्थना सुनकर ज्ञानवान अगस्त्य मुनि मंद मुस्कुराए और बोले – “नाथ! आपने मुझे किस जानकर यह प्रश्न किया?” उनके कहने का तात्पर्य था कि हे प्रभु! संसार में संहारकर्ता तो आप स्वयं हैं; मुझ जैसे तुच्छ मानव से ऐसा प्रश्न करना तो आपने केवल कृपावश, मुझे सम्मान देने के लिए ही किया है।
अगस्त्य मुनि जानते थे कि स्वयं भगवान ने अपने भक्त को महत्ता देने के लिए ही सलाह माँगी है, फिर भी वे प्रभु की आज्ञा का पालन करते हुए उनका संकल्प पुष्ट करने लगे। मुनि ने पहले भगवान की महिमा का बखान किया कि “हे पापहारी प्रभु! आपके भजन की शक्ति से ही मैं आपकी कुछ महिमा जान पाया हूँ। आपकी माया विशाल ऊमर (गूलर) के वृक्ष के समान है और अनगिनत ब्रह्माण्ड उसके फल के समान हैं। उन ब्रह्माण्ड रूपी फलों के अंदर असंख्य चराचर जीव एक छोटे-से कीट के समान निवास करते हैं और बाहर के व्यापक जगत को नहीं जान पाते। उन फलों का भक्षण करने वाला कठिन और विकराल काल है, परन्तु वह काल भी सदा आपसे भयभीत रहता है।”
इस प्रकार ऋषि ने बताया कि राम की महिमा अगम-अपार है और समय चक्र भी उनके अधीन है।
इसके बाद अगस्त्य जी ने बड़े प्रेम से प्रभु श्रीराम से वर की याचना की (ठीक वैसे ही जैसे सुतीक्ष्ण जी ने की थी)। उन्होंने कहा – “हे सर्वलोक स्वामी प्रभु! आपने मनुष्य की तरह मुझसे प्रश्न किया, यह भी मुझे सम्मान देने हेतु ही है। अतः मैं आपसे वरदान माँगता हूँ कि कृपा करके आप सीता जी और लक्ष्मण जी सहित मेरे हृदय में सदा के लिए निवास करें।”
यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता॥५॥
भावार्थ: अगस्त्य बोले – “आप तो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं और (साधारण) मनुष्य की तरह आप मुझसे पूछ रहे हैं। (उत्तर में) हे कृपा के धाम! मैं तो आपसे यही वरदान माँगता हूँ कि आप श्री सीता जी और अनुज लक्ष्मण सहित मेरे हृदय में सदा निवास करें।”
अगस्त्य मुनि आगे वरदान रूप में प्रार्थना करते हैं कि उन्हें अनन्य भक्ति, वैराग्य, सत्संग और प्रभु के चरणों में अखंड प्रेम प्राप्त हो – यही उनके लिए सबसे बड़ी सिद्धि होगी। वे कहते हैं कि यद्यपि वे निराकार परब्रह्म रूप श्रीराम को जानते-मानते हैं, फिर भी उनका मन बार-बार सगुण साकार राम में ही अनुरक्त होता है। निष्कपट भक्ति की यही सुंदर वृत्ति है कि परमात्मा के निर्गुण रूप को जानकर भी भक्त उनके सगुण स्वरूप के प्रेम में मग्न रहता है।
श्रीरामचंद्र जी ने ऋषि की इन भावनाओं को सुनकर उन्हें हृदय से लगा लिया और उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण होने का आशीर्वाद दिया। प्रभु के चरण-कमलों में बसने की लालसा ही भक्त की सर्वोत्तम अभिलाषा होती है – सुतीक्ष्ण और अगस्त्य दोनों महानुभावों ने यह वरदान पाकर स्वयं को धन्य माना।
दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान और पंचवटी प्रस्थान
अब भगवान राम अपनी वनवास की मिशन को आगे बढ़ाने के लिए तत्पर थे। मुनि अगस्त्य ने प्रभु को दंडकारण्य में आगे निवास हेतु एक अत्यंत पवित्र एवं रमणीय स्थान का सुझाव दिया। उन्होंने श्रीराम से कहा – “प्रभु! एक परम मनोहर पावन स्थल है, जिसका नाम पंचवटी है। आप कृपा कर दंडक वन को पवित्र करें तथा वहाँ निवास करके श्रेष्ठ मुनि (गौतम) के कठोर शाप का निवारण करें।”
गौतम ऋषि के शाप का उल्लेख करते हुए मुनि संकेत देते हैं कि राम के वहाँ रहने से वन का उद्धार होगा और ऋषियों पर हो रहे अत्याचार मिटेंगे। उन्होंने विनयपूर्वक आग्रह किया:
दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान और पंचवटी प्रस्थान
अब भगवान राम अपनी वनवास की मिशन को आगे बढ़ाने के लिए तत्पर थे। मुनि अगस्त्य ने प्रभु को दंडकारण्य में आगे निवास हेतु एक अत्यंत पवित्र एवं रमणीय स्थान का सुझाव दिया। उन्होंने श्रीराम से कहा – “प्रभु! एक परम मनोहर पावन स्थल है, जिसका नाम पंचवटी है। आप कृपा कर दंडक वन को पवित्र करें तथा वहाँ निवास करके श्रेष्ठ मुनि (गौतम) के कठोर शाप का निवारण करें।” गौतम ऋषि के शाप का उल्लेख करते हुए मुनि संकेत देते हैं कि राम के वहाँ रहने से वन का उद्धार होगा और ऋषियों पर हो रहे अत्याचार मिटेंगे।
आदेश स्वरूप यह निवेदन कर के अगस्त्य मुनि ने आगे कहा – “हे रघुकुल स्वामी! आप वहाँ निवास करके समस्त मुनियों पर दया कीजिए।” भगवान श्रीराम ने मुनि की आज्ञानुसार पंचवटी में रहने का निश्चय कर लिया:
चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पंचबटी निअराई॥९॥
भावार्थ: [अगस्त्य कहते हैं–] “हे रघुकुल-स्वामी! आप वहीं निवास करके सब मुनियों पर दया कीजिए (उनकी रक्षा कीजिए)।” मुनि की आज्ञा पाकर श्रीरामचंद्रजी वहाँ से चल दिए और शीघ्र ही पंचवटी के निकट जा पहुँचे।
यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रसंग आता है। महर्षि अगस्त्य ने श्रीराम को कुछ दिव्य अस्त्र-शस्त्र भेंट किए। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, भगवान विष्णु द्वारा देवराज इंद्र को प्रदान किया गया धनुष अगस्त्य मुनि के पास सुरक्षित था। जब राम उनके आश्रम आए तो अगस्त्य ने वह विष्णु धनुष सहर्ष उन्हें अर्पित किया।
साथ ही उन्होंने अक्षय तूणीर (जिसमें अनंत बाण थे) और एक दिव्य खड्ग (तलवार) भी श्रीराम को प्रदान किए, ताकि वे राक्षसों का संहार कर धर्म की स्थापना करें।
इन दिव्य अस्त्रों को पाकर रामचंद्रजी की शक्ति और तेज और बढ़ गया। दरअसल यह वही धनुष था जो विष्णु ने स्वयं त्रेतायुग के लिए अगस्त्य को दे रखा था कि उचित समय आने पर राम रूप में अवतरित विष्णु इसे धारण करें। इस प्रकार राम को उनके आराध्य देव ने स्वयं शस्त्रों से सुसज्जित कराया।
श्रीराम अब पंचवटी में निवास हेतु चले। मार्ग में उनकी भेंट गृधराज जटायु से हुई। भगवान ने जटायु जैसी वृद्ध पक्षी-वीर आत्मा के साथ आत्मीयता से व्यवहार किया और पिता समान उसका आदर किया। तत्पश्चात भगवान ने पंचवटी के सुरम्य प्रदेश में लक्ष्मण जी द्वारा कुटिया (पर्णकुटी) बनवाई और वहीं निवास करने लगे।
गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति होहिं सुहाए॥१॥
भावार्थ: जब से श्रीराम ने वहाँ (पंचवटी में) निवास किया, तब से सभी मुनि सुखी हो गए और उनका भय जाता रहा। पर्वत, वन, नदी और तालाब सब रमणीय शोभा से भर गए और दिन-प्रतिदिन अधिक सुहावने लगने लगे।
पंचवटी का यह आश्रम परिसर मानो अयोध्या का ही प्रतिरूप बन गया – श्रीराम के रहते वन के पशु-पक्षी भी आनंदित और शांति से रहने लगे थे।
इस प्रकार अरण्य काण्ड भाग 8 में हमने देखा कि भगवान राम दण्डकारण्य में भक्तों और ऋषियों को अभय देने के लिए निरंतर कार्यरत हैं। सुतीक्ष्ण मुनि के प्रेम और विनम्र भक्ति ने जहां यह उजागर किया कि भगवान केवल भक्ति और शरणागति से ही प्राप्त होते हैं, वहीं महर्षि अगस्त्य के साथ संवाद ने श्रीराम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप को रेखांकित किया – प्रभु होते हुए भी वे भक्तों को सम्मान देते हैं और उनसे शिक्षा लेते हुए दिखाई देते हैं।
सुतीक्ष्ण और अगस्त्य, दोनों प्रसंगों में प्रभु ने अपने भक्तों को हृदय से लगाया और उन्हें वही दिया जो वास्तव में कल्याणकारी है – निष्काम भक्ति और निज-सान्निध्य का वरदान। अगस्त्य द्वारा दिए गए दिव्यास्त्र यह संकेत करते हैं कि राम मानव रूप में भी परमेश्वर की शक्तियों से लैस हैं और अधर्म के विनाश हेतु संकल्पबद्ध हैं।
प्रभु रामचंद्र ने अगस्त्य मुनि को वचन दिया था कि वे दंडकवन को राक्षसों से मुक्त कर मुनियों को निर्भय करेंगे। पंचवटी में निवास इसी संकल्प का केन्द्र बना। आगे आने वाले प्रसंगों में यहीं पर शूर्पणखा का आगमन, खर-दूषण जैसे राक्षसों का वध, स्वर्ण मृग (मारीच) की घटना और सीता हरण जैसी घटनाएँ घटित होंगी, जो रामायण की कथा को चरम मोड़ तक ले जाएंगी।






