विस्तृत उत्तर
जब देवता महर्षि दधीचि के आश्रम पहुँचे और उनसे अपनी अस्थियाँ माँगीं, तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के उनकी प्रार्थना सुनी। यह वही इंद्र थे जिन्होंने कुछ कथाओं के अनुसार एक बार दधीचि का सिर काट दिया था। इसके बावजूद महर्षि दधीचि ने परोपकार के सर्वोच्च सिद्धांत को अपनाते हुए तुरंत अपनी देह का त्याग करने का निर्णय लिया। उनका मानना था कि यह शरीर एक न एक दिन नष्ट हो ही जाएगा, इसलिए यदि यह किसी उपयोगी उद्देश्य की पूर्ति कर सके तो ऐसा ही होना चाहिए। यह निस्वार्थ त्याग की सर्वोच्च भावना थी।
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