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विस्तृत उत्तर
सच्चा आचार्य वह है जो स्वयं आचरण करता है और दूसरों को भी आचार में नियोजित करता है। पाठ में यह भी कहा गया है कि वह शास्त्रों के अर्थों का परिशीलन करता है। इसलिए आचार्य केवल बोलने वाला शिक्षक नहीं, बल्कि आचरण से मार्ग दिखाने वाला और शास्त्रार्थ को समझने-समझाने वाला पुरुष है। उसके भीतर विनय, सरलता, इन्द्रियनिग्रह और लोभरहितता भी अपेक्षित है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 58, श्लोक 15
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