दीपावली रात्रि में महालक्ष्मी एवं श्रीगणेश पूजन की शास्त्रसम्मत विधि, अनुष्ठानिक प्रक्रिया तथा दार्शनिक मीमांसा
प्रस्तावना एवं तात्विक विवेचन
सनातन धर्म के सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं देदीप्यमान पर्वों में दीपावली का स्थान सर्वोपरि है। यह केवल एक लौकिक अथवा सामाजिक उत्सव मात्र नहीं है, अपितु तांत्रिक, मांत्रिक एवं पौराणिक दृष्टिकोण से यह एक अत्यंत विशिष्ट खगोलीय एवं आध्यात्मिक कालखंड है, जिसमें ब्रह्मांडीय ऊर्जा अपने सर्वोच्च स्तर पर सक्रिय होती है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या की घोर अंधकारमयी महारात्रि में जब सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश क्षीण हो जाता है, तब दीपों की अविरल शृंखला के माध्यम से आत्म-ज्योति का प्रकटीकरण किया जाता है । पुराणों एवं धर्मशास्त्रों के अनुसार, इसी पावन तिथि पर क्षीरसागर के मंथन के फलस्वरूप भगवती महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था ।
दीपावली का शाब्दिक अर्थ 'दीपों की अवालि' अर्थात् दीपों की पंक्ति है, जो अज्ञान रूपी अंधकार पर ज्ञान रूपी प्रकाश, और अलक्ष्मी (दरिद्रता एवं विपन्नता) पर महालक्ष्मी (समृद्धि एवं ऐश्वर्य) की शाश्वत विजय का प्रतीक है । इस महारात्रि में प्रथम पूज्य श्रीगणेश (विघ्नहर्ता एवं सद्बुद्धि के अधिष्ठाता) तथा भगवती महालक्ष्मी (धन, ऐश्वर्य एवं श्री की अधिष्ठात्री) का संयुक्त रूप से शास्त्रोक्त विधान के अनुसार पूजन किया जाता है। धन-संपदा के विवेकपूर्ण, धर्मसम्मत एवं रचनात्मक उपयोग हेतु महालक्ष्मी के साथ-साथ श्रीगणेश का पूजन अनिवार्य माना गया है, क्योंकि बिना सद्बुद्धि के प्राप्त धन मनुष्य के लिए अनर्थ, अहंकार एवं विनाश का कारण बन सकता है । यह शोध-प्रबंध पूर्णतः 'धर्मसिन्धु', 'निर्णयसिन्धु', 'स्कंद पुराण', 'गणेश पुराण', 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' एवं 'लक्ष्मी तंत्र' जैसे अत्यंत प्रामाणिक ग्रंथों के आधार पर दीपावली पूजन की शास्त्रसम्मत विधि, काल-निर्णय, अलक्ष्मी निस्सारण, बही-खाता पूजन और व्रत के कठोर निषेधों का गहन एवं तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत करता है。
दीपावली पूजन का शास्त्रीय काल-निर्णय एवं मुहूर्त मीमांसा
दीपावली पर्व एवं महालक्ष्मी पूजन के लिए कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या की तिथि का विधान शास्त्रों में सर्वसम्मति से निर्धारित है। 'धर्मसिन्धु' तथा 'निर्णयसिन्धु' जैसे काल-निर्णय के प्रामाणिक ग्रंथों में दीपावली के काल-निर्णय हेतु अत्यंत सूक्ष्म गणितीय एवं खगोलीय व्यवस्था दी गई है, जिसके आधार पर ही अनुष्ठान का वास्तविक फल प्राप्त होता है。
निर्णयसिन्धु के प्रथम परिच्छेद के पृष्ठ छब्बीस पर स्पष्ट निर्देश प्राप्त होता है कि जब अमावस्या तिथि दो दिन तक प्रदोष काल में व्यापिनी हो, तो निर्णय 'युग्म' सिद्धांत के अनुसार करना चाहिए । धर्मशास्त्रों का यह स्पष्ट उद्घोष है: "प्रदोषार्धरात्रव्यापिनी मुख्या एकैक व्याप्तौ परैव" । अर्थात्, यदि अमावस्या सूर्यास्त के उपरांत एक घटी चवालीस पल (जो कि प्रदोष काल की अवधि है) तक व्याप्त रहती है, तो उसी दिन दीपावली का महान पर्व मनाना शास्त्रसम्मत है । यदि तिथि दो दिन तक प्रदोष काल को स्पर्श करती है, तो प्रतिपदा से युक्त दूसरी अमावस्या को ग्रहण करना महाफलदायी माना गया है ।
दीपावली की इस महारात्रि को 'महानिशा' की संज्ञा दी गई है। इस रात्रि में पूजन के लिए मुख्य रूप से चार खगोलीय कालों का विधान शास्त्रों में प्राप्त होता है, जिनका विवरण एवं शास्त्रीय महत्व इस प्रकार है:
| पूजन काल का नाम | समयावधि (सूर्यास्त के सापेक्ष) | शास्त्रीय महत्व एवं अनुष्ठानिक पात्रता |
|---|---|---|
| प्रदोष काल | सूर्यास्त से लगभग दो घंटे चौबीस मिनट तक | यह गृहस्थों, वणिकों एवं सामान्य जनों के लिए सर्वश्रेष्ठ काल है। इस काल में स्थिर लग्न का समावेश अत्यंत फलदायी होता है तथा इसमें श्रीगणेश-लक्ष्मी का सात्विक पूजन किया जाता है । |
| वृषभ काल (स्थिर लग्न) | प्रदोष काल के मध्य का समय | वृषभ एक स्थिर लग्न है। ज्योतिषीय मान्यता है कि स्थिर लग्न में शास्त्रोक्त पूजन करने से भगवती लक्ष्मी का गृह में स्थायी (स्थिर) वास होता है और चंचला लक्ष्मी चलायमान नहीं होतीं । |
| महानिशीथ काल | मध्यरात्रि (प्रायः रात्रि ग्यारह बजकर उनतालीस मिनट से बारह बजकर बत्तीस मिनट तक) | यह समय तांत्रिकों, अघोरियों एवं विशेष मंत्र सिद्धि करने वाले साधकों के लिए अत्यंत उपयुक्त है। इस काल में अलक्ष्मी निस्सारण एवं महाकाली सहित विशेष शक्तियों का आवाहन किया जाता है । |
| सिंह लग्न | अर्धरात्रि के पश्चात् का समय | सिंह लग्न में जागरण कर श्रीसूक्त, कनकधारा स्तोत्र अथवा महालक्ष्म्यष्टकम् का पाठ करने से दारिद्र्य का समूल नाश होता है और अष्टसिद्धियों की प्राप्ति होती है । |
गृहस्थ जीवन व्यतीत करने वाले साधकों को मुख्य रूप से प्रदोष काल एवं वृषभ लग्न में सात्विक पूजन करना चाहिए, तथा किसी भी प्रकार की उग्र तांत्रिक साधना या तामसिक प्रयोगों से बचना चाहिए, क्योंकि बिना योग्य गुरु-निर्देश के महानिशीथ काल की उग्र साधना साधक के लिए अनिष्टकारी हो सकती है ।
पूजन-पूर्व की शास्त्रीय प्रस्तुतियां एवं शुद्धि विधान
दीपावली के महापूजन से पूर्व शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं भौतिक शुद्धि का अत्यंत विशिष्ट महत्त्व है। भगवती लक्ष्मी केवल वहीं वास करती हैं जहाँ बाह्य एवं आंतरिक स्वच्छता, पवित्रता एवं निर्मलता का पूर्ण साम्राज्य होता है ।
दीपावली से पूर्व संपूर्ण गृह एवं कार्यस्थल की गहन स्वच्छता अनिवार्य है। घर के जाले, धूल और अवांछित पुरानी वस्तुओं को बाहर निकालना चाहिए, क्योंकि अथर्ववेद के अनुसार ये अलक्ष्मी (दरिद्रता) और नकारात्मक शक्तियों के वास-स्थान माने गए हैं । द्वार पर आम अथवा अशोक के पत्तों से निर्मित वंदनवार लगाना चाहिए, तथा मुख्य द्वार पर चावल के आटे और हल्दी से रंगोली (अल्पना) बनानी चाहिए, जो कि सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करने का प्राचीन विज्ञान है ।
साधक को स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ, नूतन अथवा धुले हुए श्वेत या गुलाबी वस्त्र धारण करने चाहिए, क्योंकि माता लक्ष्मी को गुलाबी एवं श्वेत रंग अत्यंत प्रिय है । पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख होकर कुशासन या ऊनी आसन पर बैठना चाहिए। नीले अथवा काले वस्त्र पहनकर महालक्ष्मी का पूजन सर्वथा वर्जित माना गया है ।
पूजन आरंभ करने से पूर्व 'पवित्रीकरण' मंत्र का उच्चारण करते हुए अपने शरीर और संपूर्ण पूजन सामग्री पर कुशा अथवा आम्र-पल्लव से गंगाजल छिड़कना चाहिए। इसका मंत्र इस प्रकार है:
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
इस मंत्र का अर्थ है कि मनुष्य अपवित्र हो या पवित्र, वह किसी भी अवस्था में क्यों न हो, जो साधक भगवान पुण्डरीकाक्ष (श्री विष्णु) का हृदय से स्मरण करता है, वह बाहर और भीतर दोनों से पूर्णतः पवित्र हो जाता है। तदुपरांत आचमनी से तीन बार जल ग्रहण कर आचमन करना चाहिए (ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः), जिससे अंतःकरण और वाक् की शुद्धि होती है ।
पूजन-स्थान की व्यवस्था एवं मंडप निर्माण
वास्तुशास्त्र और धर्मशास्त्रों के अनुसार, दीपावली पूजन के लिए घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) को सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वाधिक पवित्र माना गया है । एक उन्नत चौकी (काष्ठ का आसन) लेकर उस पर दाहिनी ओर लाल वस्त्र तथा बायीं ओर श्वेत वस्त्र बिछाना चाहिए ।
लाल वस्त्र पर भगवती महालक्ष्मी एवं श्रीगणेश की नूतन, स्वर्ण, रजत, पीतल अथवा स्वच्छ मिट्टी की प्रतिमाओं की स्थापना करनी चाहिए । शास्त्रोक्त नियम यह है कि लक्ष्मी जी को गणेश जी के दाहिने ओर (दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर) स्थापित करना चाहिए । प्रतिमा ऐसी होनी चाहिए जिसमें भगवती लक्ष्मी पूर्ण खिले हुए गुलाबी कमल पर विराजमान हों और उनके श्रीहस्त से धन-वर्षा हो रही हो । उल्लू पर आसीन लक्ष्मी की प्रतिमा गृहस्थों के लिए वर्जित मानी गई है; ऐरावत हाथियों द्वारा अभिषिक्त गजलक्ष्मी का स्वरूप सर्वश्रेष्ठ है。
चौकी के समीप अक्षत (बिना टूटे हुए चावल) की ढेरी बनाकर उस पर तांबे, पीतल अथवा मिट्टी का कलश (वरुण देव का प्रतीक) स्थापित करना चाहिए। कलश में शुद्ध जल, गंगाजल, सुपारी, एक सिक्का, दूर्वा, हल्दी की गांठ और सर्वोषधि डालनी चाहिए। कलश के मुख पर आम के पाँच अथवा सात पल्लव रखकर उस पर एक पूर्ण पात्र (चावल से भरा हुआ) और एक जटाधारी नारियल (लाल वस्त्र या कलावा से लपेटा हुआ) स्थापित किया जाता है । यह कलश संपूर्ण ब्रह्मांड, समुद्र और उसमें स्थित शक्तियों का प्रतीक है。
बायीं ओर बिछे श्वेत वस्त्र पर अक्षत के नौ पुंज बनाकर नवग्रह की स्थापना की जाती है तथा लाल वस्त्र पर गेहूं के सोलह पुंज बनाकर षोडशमातृका की स्थापना की जाती है । इन सभी के मध्य में एक अखंड दीप प्रज्वलित किया जाता है, जो साक्षात सूर्य और अग्नि का प्रतीक है, और जो संपूर्ण रात्रि प्रज्वलित रहना चाहिए ।
संकल्प विधि एवं आत्म-शुद्धि
सनातन धर्म के कर्मकांडीय विधान में किसी भी अनुष्ठान का मूल आधार 'संकल्प' होता है। बिना संकल्प के किए गए किसी भी धार्मिक कर्म का फल दिशाहीन हो जाता है और उसे देवराज इंद्र ग्रहण कर लेते हैं । दाहिने हाथ में शुद्ध जल, अक्षत, पुष्प, दूर्वा एवं द्रव्य (सिक्का) लेकर दृढ़तापूर्वक संकल्प लेना चाहिए ।
साधक को देश (स्थान), काल (संवत्सर, मास, पक्ष, तिथि), अपना नाम और गोत्र का स्पष्ट उच्चारण करना चाहिए। संकल्प का शास्त्रीय मंत्र इस प्रकार है:
"अद्य अमुक गोत्रे उत्पन्नोऽहं अमुक नाम्नोऽहं... श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थं, मम सपरिवारस्य आयुरारोग्यैश्वर्य अभिवृद्ध्यर्थं, आस्थिर लक्ष्मी प्राप्त्यर्थं, चिरकाल संरक्षणार्थं, आधि-व्याधि-जरा-पीड़ा-दोष शमनार्थं, श्री महालक्ष्मी-श्रीगणेश-कुबेर-नवग्रह-लेखनी-दवात पूजनं अहं करिष्ये।"
इस मंत्र का अर्थ है कि मैं (अमुक नाम, अमुक गोत्र), अपने सपरिवार की आयु, आरोग्य, और ऐश्वर्य की निरंतर वृद्धि के लिए, स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति और उनके चिरकाल तक मेरे गृह में वास के लिए, तथा सभी प्रकार की आधि-व्याधि, रोग और दोषों के पूर्ण शमन के लिए यह दीपावली पर्व पर श्री महालक्ष्मी, श्रीगणेश, कुबेर, नवग्रह और बही-खाता का पूजन कर रहा हूँ। संकल्प के उपरांत हाथ में लिए गए जल और सामग्री को भूमि पर या ताम्र पात्र में छोड़ देना चाहिए。
प्रथम पूज्य श्रीगणेश का आवाहन एवं पूजन
'गणेश पुराण' और 'मुद्गल पुराण' के अनुसार, किसी भी शुभ कर्म से पूर्व विघ्नहर्ता श्रीगणेश का पूजन अनिवार्य है, ताकि संपूर्ण अनुष्ठान निर्विघ्न संपन्न हो सके । दीपावली पर धन के साथ सद्बुद्धि की आवश्यकता होती है, इसीलिए श्रीगणेश की पूजा सर्वप्रथम की जाती है。
सर्वप्रथम भगवान गणपति का हृदय में ध्यान करना चाहिए:
ॐ गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वपादपङ्कजम्॥
अथवा
ॐ विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लंबोदराय सकलाय जगतिताय...
हाथ में अक्षत एवं पुष्प लेकर श्रीगणेश का आवाहन करें और मूर्ति पर अर्पित करें। आवाहन के लिए गणेश मंत्र: "ॐ गं गणपतये नमः" अथवा "ॐ एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥" का सस्वर पाठ करना चाहिए । श्रीगणेश को पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान कराकर पीत वस्त्र, जनेऊ (यज्ञोपवीत), अष्टगंध, चंदन, अक्षत, दूर्वा (भगवान गणेश को दूर्वा अत्यंत प्रिय है), लाल पुष्प (विशेषकर जास्वंद या गुड़हल), धूप, दीप और नैवेद्य (मोदक अथवा लड्डू) अर्पित करना चाहिए ।
भगवती महालक्ष्मी का आवाहन एवं षोडशोपचार पूजन
श्रीगणेश पूजन के उपरांत 'लक्ष्मी तंत्र' (अध्याय अड़तालीस) तथा अन्य पुराणों में वर्णित विधि के अनुसार माता महालक्ष्मी का 'षोडशोपचार' (सोलह प्रकार के विशिष्ट उपचारों से) पूजन किया जाता है । यह पूजन की सबसे प्रामाणिक एवं शास्त्रीय पद्धति है जो देवी को प्रसन्न करने का अचूक साधन है。
- प्रथम उपचार (ध्यान): हाथ में कमल का पुष्प लेकर भगवती का ध्यान करना चाहिए: ॐ नमस्तेस्तु महामाये, श्रीपीठे सुरपूजिते। शंख चक्र गदा हस्ते, महालक्ष्मी नमोस्तुते॥
- द्वितीय उपचार (आवाहन): ऋग्वेद के खिल भाग 'श्रीसूक्त' के प्रथम मंत्र के साथ भगवती का आवाहन करना चाहिए: ॐ तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥ इस वैदिक मंत्र का अर्थ है: हे अग्निदेव! आप मेरे लिए उन स्थिर महालक्ष्मी का आवाहन करें, जो कभी नष्ट न होने वाली हों, जो मुझे छोड़कर कहीं न जाएं, तथा जिनके प्रभाव से मैं प्रचुर स्वर्ण, गौ, अश्व एवं बंधु-बांधवों को प्राप्त कर सकूँ।
- तृतीय उपचार (आसन): "श्री महालक्ष्म्यै नमः आसनं समर्पयामि" कहकर भगवती को बैठने हेतु आसन स्वरूप एक स्वच्छ कमल का पुष्प अर्पित करना चाहिए।
- चतुर्थ से षष्ठम उपचार (पाद्य, अर्घ्य, आचमन): भगवती के श्रीचरणों को धोने के भाव से सुगंधित जल (पाद्य), हाथों को धोने के लिए जल (अर्घ्य), और मुख शुद्धि के लिए कर्पूर मिश्रित जल (आचमन) अर्पित किया जाता है ।
- सप्तम उपचार (स्नान): सर्वप्रथम पञ्चामृत (गाय का दूध, दही, घी, शहद, और शर्करा) से माता को स्नान कराया जाता है: "श्री महालक्ष्म्यै नमः पञ्चामृत स्नानं समर्पयामि" । पञ्चामृत स्नान के पश्चात शुद्ध जल अथवा गंगाजल से स्नान कराया जाता है । यहाँ एक विशिष्ट शास्त्रीय विधान यह है कि यदि मूर्ति धात्विक (सोने, चांदी या पीतल की) अथवा पाषाण की हो, तभी यह वास्तविक स्नान कराया जाता है। चित्र अथवा कच्ची मिट्टी की मूर्ति होने पर केवल प्रतीक रूप में पुष्प के माध्यम से जल का छींटा दिया जाता है ।
- अष्टम एवं नवम उपचार (वस्त्र एवं आभूषण): भगवती को नूतन वस्त्र (लाल या गुलाबी रंग के) एवं उपवस्त्र के रूप में सुनहरी गोटेदार चुनरी अर्पित की जाती है। "श्री महालक्ष्म्यै नमः वस्त्रं समर्पयामि" । इसके उपरांत आभूषण और शृंगार सामग्री अर्पित की जाती है।
- दशम उपचार (गंध): माता को अष्टगंध, कुमकुम, केसर और सिंदूर का तिलक लगाया जाता है। "श्री महालक्ष्म्यै नमः गन्धं समर्पयामि" । माता को सुगन्धित इत्र भी अर्पित किया जाता है जो उन्हें अत्यंत प्रिय है ।
- एकादश उपचार (अक्षत एवं पुष्प): खंडित न हुए पूर्ण चावल (अक्षत) अर्पित किए जाते हैं। माता लक्ष्मी को लाल गुलाब और विशेषकर 'कमल का पुष्प' सर्वाधिक प्रिय है । "श्री महालक्ष्म्यै नमः पुष्पमालां समर्पयामि।" मान्यता है कि पूजा के बाद एक लाल कपड़े में कमल का फूल बांधकर अपनी तिजोरी में रखने से धन की स्थिरता होती है ।
- द्वादश और त्रयोदश उपचार (धूप एवं दीप): माता के सम्मुख गुग्गुल अथवा दशांग की धूप प्रज्वलित की जाती है । "श्री महालक्ष्म्यै नमः धूपं आघ्रापयामि।" तत्पश्चात गाय के शुद्ध घी का पंचमुखी दीपक दिखाया जाता है । "श्री महालक्ष्म्यै नमः दीपं दर्शयामि।"
- चतुर्दश उपचार (नैवेद्य): माता लक्ष्मी को मिष्ठान, ऋतुफल, मखाने की खीर, बताशे और चीनी के खिलौने अत्यंत प्रिय हैं । "श्री महालक्ष्म्यै नमः नैवेद्यं निवेदयामि।" नैवेद्य अर्पित करते समय आचमनी से जल घुमाकर आचमन कराया जाता है।
- पंचदश उपचार (ताम्बूल एवं दक्षिणा): एक स्वच्छ पान के पत्ते पर लौंग, इलायची, और सुपारी रखकर ताम्बूल अर्पित किया जाता है । इसके साथ ही द्रव्य (दक्षिणा स्वरूप सिक्के) अर्पित किए जाते हैं। "श्री महालक्ष्म्यै नमः दक्षिणां समर्पयामि" ।
- षोडश उपचार (आरती एवं पुष्पांजलि): अंत में सपरिवार खड़े होकर कर्पूर एवं घी के दीपक से महालक्ष्मी जी की आरती ("ॐ जय लक्ष्मी माता") का गायन किया जाता है । आरती के पश्चात दोनों हाथों में पुष्प लेकर मंत्र पुष्पांजलि अर्पित की जाती है: "श्री महालक्ष्म्यै नमः पुष्पांजलि समर्पयामि" ।
पूजन के अंत में अपनी भूल-चूक और त्रुटियों के लिए क्षमा याचना करना अनिवार्य है, अन्यथा अनुष्ठान अपूर्ण माना जाता है:
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥ मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि। यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अर्थात् हे परमेश्वरी! मैं न तो आवाहन जानता हूँ, न विसर्जन, और न ही पूजा की कोई शास्त्रोक्त विधि जानता हूँ। मंत्र, क्रिया और भक्ति से हीन मेरी इस पूजा को आप अपनी दयालुता से परिपूर्ण करें और मुझे क्षमा करें। इसके पश्चात् आसन के नीचे थोड़ा जल छोड़कर उसे मस्तक पर लगाना चाहिए ताकि इंद्र पूजा का फल न चुरा सकें ।
अष्टलक्ष्मी, कुबेर एवं बही-खाता (लेखनी-दवात) पूजन
दीपावली का पर्व न केवल आध्यात्मिक सिद्धि का है, अपितु व्यापारिक एवं वणिक वर्ग के लिए यह नूतन वर्ष के आर्थिक लेखा-जोखा के आरंभ का भी सबसे बड़ा मुहूर्त है । अतः इस दिन अष्टलक्ष्मी, कुबेर एवं बही-खातों का विशेष पूजन किया जाता है。
अष्टलक्ष्मी पूजन
महालक्ष्मी के आठ स्वरूपों की पूजा हाथ में अक्षत लेकर इस मंत्र से की जाती है, जिससे जीवन के आठों आयामों में पूर्णता प्राप्त होती है: ॐ आद्ये लक्ष्म्यै नम:, ॐ विद्यालक्ष्म्यै नम:, ॐ सौभाग्य लक्ष्म्यै नम:, ॐ अमृत लक्ष्म्यै नम:, ॐ लक्ष्म्यै नम:, ॐ सत्य लक्ष्म्यै नम:, ॐ भोगलक्ष्म्यै नम:, ॐ योग लक्ष्म्यै नम: ।
भगवान कुबेर पूजन
भगवान कुबेर यक्षों के राजा और देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं। धन के स्थायी संरक्षण और तिजोरी की वृद्धि के लिए कुबेर का पूजन अत्यंत अनिवार्य है। एक लाल कपड़े पर धन (सिक्के, आभूषण) रखकर भगवान कुबेर का ध्यान करना चाहिए: ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये, धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥ पूजा के पश्चात एक नूतन थैली में हल्दी की पांच गांठें, कमलगट्टा, अक्षत, दूर्वा, साबुत धनिया और दक्षिणा (कुछ चांदी के सिक्के) रखकर, उसे कुबेर का स्वरूप मानकर अपनी तिजोरी या गल्ले में रखना चाहिए । यह प्रयोग धन की निरंतर वृद्धि करता है और तिजोरी को कभी रिक्त नहीं होने देता ।
बही-खाता, दवात एवं लेखनी पूजन
प्राचीन काल से ही व्यापारी वर्ग दीपावली की संध्या पर प्रदोष काल में अपने नए बही-खातों का पूजन करते हैं । नवीन बही-खातों पर केसर युक्त चंदन से 'स्वास्तिक' का मंगल चिह्न बनाया जाता है और उसके ऊपर 'श्री गणेशाय नमः' लिखा जाता है । गंध, पुष्प, धूप, दीप से उनका पूजन किया जाता है。
दवात (स्याही) को भगवती महाकाली का प्रत्यक्ष स्वरूप माना जाता है। दवात पर सिंदूर से स्वस्तिक बनाकर कलावा लपेटना चाहिए। मंत्र: ॐ श्रीमहाकाल्यै नमः। प्रार्थना: कालिके! त्वं जगन्मातः मसिरूपेण वर्तसे। उत्पन्ना त्वं च लोकानां व्यवहारप्रसिद्धये॥ (हे कालिके! आप साक्षात् जगन्माता हैं जो इस स्याही के रूप में विद्यमान हैं, मेरे व्यापार और व्यवहार की प्रसिद्धि के लिए आप यहाँ उत्पन्न हुई हैं) ।
लेखनी (कलम) पर मौली (कलावा) बांधकर उसे सामने रखा जाता है। कलम में भगवान चित्रगुप्त और ज्ञान की देवी सरस्वती का आवाहन किया जाता है । मंत्र: ॐ मसि त्वं लेखनीयुक्ता चित्रगुप्ताशयस्थिता। सदक्षराणां पत्रे च लेख्यं कुरु सदा मम॥ ।
दीप प्रज्वलन का तात्विक महत्व एवं दीपदान विधान
दीपावली केवल बाह्य मृदा-दीपकों का उत्सव नहीं है, अपितु यह अंतर्ज्योति के प्रज्वलन का भी पर्व है। 'स्कंद पुराण' में दीपदान की अपार महिमा का वर्णन है। दीप प्रज्वलन से पितरों के मार्ग को प्रशस्त किया जाता है तथा यमराज को प्रसन्न किया जाता है, जिससे अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है ।
दीपों की संख्या के विषय में शास्त्रों में ग्यारह, इक्कीस अथवा इक्यावन दीपकों को प्रज्वलित करने का विधान है । माता लक्ष्मी और भगवान गणेश के सम्मुख एक बड़ा अखंड दीपक जलाना चाहिए, जो तिल के तेल अथवा गाय के शुद्ध घी से पूर्ण हो । यह अखंड दीपक साक्षात् 'सूर्य' और 'लक्ष्मी' का सम्मिलित स्वरूप माना जाता है । अन्य छोटे दीपकों को घर के प्रत्येक कोने, छत, छज्जे, मुख्य द्वार, तुलसी के पौधे के समीप, जल-स्रोत के पास, गौशाला तथा घर के देवालय में स्थापित करना चाहिए ।
रात्रि जागरण के समय उसी बड़े अखंड दीपक की लौ पर एक चम्मच या किसी पात्र को उलटा रखकर काजल (अंजन) प्राप्त किया जाता है। इस पवित्र काजल को पूजा के उपरांत परिवार के सभी सदस्य अपनी आँखों में लगाते हैं, जो बुरी दृष्टि, नजर दोष और नकारात्मकता से पूर्ण रक्षा करता है ।
अलक्ष्मी निस्सारण विधान (अथर्ववेद के परिप्रेक्ष्य में)
दीपावली महारात्रि की सबसे विशिष्ट और गुप्त तांत्रिक क्रिया 'अलक्ष्मी निस्सारण' (दरिद्रता को घर से बाहर निकालना) है। अथर्ववेद के प्रथम कांड का अठारहवाँ सूक्त 'अलक्ष्मी नाशन सूक्त' कहलाता है ।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, महालक्ष्मी की एक ज्येष्ठा भगिनी (बड़ी बहन) हैं जिन्हें 'अलक्ष्मी', 'ज्येष्ठा' या 'दरिद्रा' कहा गया है। जब देवों और दानवों ने समुद्र मंथन किया था, तब अमृत और लक्ष्मी से पूर्व हलाहल विष के साथ अलक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था । जहाँ गंदगी, कलह, आलस्य, अंधकार और अभक्ष्य भक्षण होता है, वहाँ अलक्ष्मी का स्थायी वास हो जाता है । दीपावली का पर्व मूलतः अलक्ष्मी के निष्कासन और महालक्ष्मी के आमंत्रण का ही पर्व है。
अलक्ष्मी निस्सारण की प्रक्रिया महानिशीथ काल (मध्यरात्रि) में संपन्न की जाती है । इस विशिष्ट समय में घर की महिलाएं एक नई सींक वाली झाड़ू (मार्जनी) से घर के आंतरिक भागों से सफाई करते हुए कूड़े को मुख्य द्वार से बाहर लाती हैं। अमावस्या की मध्यरात्रि में रज और तम गुण प्रधान होते हैं, अतः इस समय कूड़ा-करकट घर से बाहर फेंकना अलक्ष्मी और घर की नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालने का शक्तिशाली प्रतीक है । कूड़ा बाहर फेंकते समय सूप अथवा शंख बजाकर ध्वनि की जाती है, जिससे नकारात्मक ऊर्जा भयभीत होकर निष्कासित हो जाती है ।
इस प्रक्रिया के समय अलक्ष्मी नाशन मंत्र का मानसिक जप किया जाता है:
"क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्। अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥"
(मैं भूख, प्यास और मलिनता की प्रतीक ज्येष्ठा अलक्ष्मी का नाश करता हूँ। हे देवि! मेरे घर से सभी प्रकार की दरिद्रता और दारुण दुःखों को दूर करो) ।
यह संपूर्ण वर्ष में एकमात्र ऐसी रात्रि है जब मध्यरात्रि में झाड़ू लगाना और कूड़ा बाहर फेंकना शुभ माना गया है, अन्यथा सामान्य दिनों में सूर्यास्त के पश्चात यह कार्य सर्वथा वर्जित और अशुभ माना जाता है ।
व्रत के नियम, निषेध तथा दान विधान
दीपावली के इस पावन पर्व पर आचरण और व्यवहार की पूर्ण शुद्धता अत्यंत आवश्यक है। 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' तथा 'स्कंद पुराण' में इस दिन के लिए कड़े निषेधों और कठोर नियमों का उल्लेख प्राप्त होता है。
- द्यूत (जुआ) एवं व्यसन का निषेध: शास्त्रों में द्यूत (जुआ) एवं व्यसन का पूर्णतः निषेध किया गया है। दीपावली के दिन जुआ खेलना एक भयंकर सामाजिक और धार्मिक कुरीति है, जिसका शास्त्रों से कोई संबंध नहीं है। जहाँ जुआ, मदिरा और व्यसन होता है, वहाँ लक्ष्मी 'वित्त' (दुःख देने वाला धन) बन जाती हैं और अंततः अलक्ष्मी का रूप ले लेती हैं । यह पूर्णतः सात्विक पर्व है, अतः इस दिन मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज अथवा किसी भी तामसिक वस्तु का भक्षण सर्वथा निषिद्ध है ।
- सदाचार का पालन: जिस घर में स्त्रियों का अपमान होता है, वृद्धों का तिरस्कार होता है, कलह होती है अथवा मिथ्या भाषण किया जाता है, वहाँ महालक्ष्मी एक क्षण भी नहीं ठहरतीं ।
- मैथुन एवं तैल मर्दन निषेध: 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' के अनुसार, अमावस्या, विशेषकर दीपावली की रात्रि में स्त्री-सहवास (मैथुन) सर्वथा निषिद्ध है तथा शरीर पर तेल की मालिश करना भी वर्जित है ।
- रात्रि जागरण: इस रात्रि में साधक को शयन नहीं करना चाहिए, अपितु पूर्ण रात्रि जागरण कर भगवती का मंत्र जप, श्रीसूक्त के सोलह मंत्रों का पाठ, कनकधारा स्तोत्र तथा इन्द्रकृत 'महालक्ष्म्यष्टकम्' (नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते...) का त्रिकाल पाठ करना चाहिए ।
- दान का महत्व: इस दिन सुवर्ण दान, अन्न दान, गो-दान और वस्त्र दान का अनंत गुना फल प्राप्त होता है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार दरिद्रों और सुपात्र ब्राह्मणों को दान अवश्य करना चाहिए । जो व्यक्ति निर्मल चित्त वाला हो, परनिंदा से सर्वथा मुक्त हो और जो सद्गुणों का आचरण करता हो, उसी साधक पर भगवती की पूर्ण कृपा होती है। केवल बाह्य तीर्थ स्नान या कर्मकांड से मलिन अंतःकरण कभी शुद्ध नहीं होता ।
महानिशीथ काल की तांत्रिक एवं मांत्रिक साधना
दीपावली की रात्रि को तंत्र शास्त्र में 'कालरात्रि', 'मोहरात्रि' और 'महारात्रि' के समान अत्यंत सिद्ध रात्रि माना गया है । महानिशीथ काल (मध्यरात्रि लगभग ग्यारह बजकर उनतालीस मिनट से बारह बजकर बत्तीस मिनट तक) में तांत्रिक, ज्योतिषी और उच्च कोटि के उपासक मंत्र सिद्धि करते हैं ।
इस काल में महाकाली का पूजन भी विशेष रूप से किया जाता है, जो कि पूर्वी भारत (बंगाल, असम आदि) की प्रमुख परंपरा है । जो साधक श्री विद्या या भगवती पीताम्बरा (बगलामुखी) के उपासक हैं, वे इस रात्रि में विशेष यंत्रों (जैसे श्रीयंत्र, अष्टलक्ष्मी यंत्र, व्यापार वृद्धि यंत्र) की स्थापना कर भोजपत्र पर अष्टगंध, केसर और अनार की कलम से यंत्र निर्माण करते हैं ।
इस रात्रि में कुछ विशिष्ट मंत्रों का जप अत्यंत फलदायी होता है:
- "ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री सिद्ध लक्ष्म्यै नमः"
- "ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्म्यै नमः"
- "ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः"
तंत्र शास्त्र के अनुसार, इस महारात्रि में जपा गया एक मंत्र भी कई गुना अधिक ऊर्जावान होकर शीघ्र सिद्ध हो जाता है。
फलश्रुति एवं उपसंहार
'स्कंद पुराण' और 'गणेश पुराण' के विशिष्ट अध्यायों के अनुसार, जो मनुष्य इस शास्त्रसम्मत विधि से, अहंकार रहित होकर, पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ दीपावली की महारात्रि में श्रीगणेश, कुबेर एवं भगवती महालक्ष्मी का षोडशोपचार पूजन करता है, वह सात जन्मों तक दारिद्र्य का मुख नहीं देखता ।
पूजन के उपरांत प्रज्वलित दीपों का प्रकाश केवल भौतिक अंधकार को नहीं मिटाता, अपितु व्यक्ति के अंतःकरण में व्याप्त अज्ञान, काम, क्रोध, लोभ और मोह रूपी सघन तमस को भी समूल भस्म कर देता है । यह व्रत और निष्काम कर्म परिवार की तीन पीढ़ियों के पितृदोष, दरिद्रता और कालसर्प दोष को शमित करने की विलक्षण क्षमता रखता है ।
अंततः, दीपावली का महान पर्व हमें यह परम सत्य और जीवन-दर्शन सिखाता है कि वास्तविक लक्ष्मी वही है जो धर्म के मार्ग से अर्जित की जाए और परमार्थ एवं समाज-कल्याण के मार्ग में व्यय हो। जिस धन के साथ नारायण (सद्गुण और विवेक) नहीं होते, वह धन अलक्ष्मी बनकर नाश, कलह और पतन का कारण बनता है। अतः पूर्ण निष्ठा, वैदिक मंत्रों के पवित्र गुंजन और सात्विक भाव के साथ संपन्न किया गया यह अनुष्ठान, साधक के जीवन में भौतिक समृद्धि के साथ-साथ आध्यात्मिक उत्थान एवं मोक्ष का भी प्रशस्त मार्ग निर्मित करता है。






