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विस्तृत उत्तर
धर्म से अभीष्ट फल इसलिए मिलता है क्योंकि धर्म कुशल और धारणयोग्य कर्म है। पाठ में आचार्य लोग जिस कर्म से अभीष्ट की प्राप्ति होती है उसे धर्म कहते हैं। इसके विपरीत जिससे अनिष्ट फल की प्राप्ति होती है, वह अधर्म कहा गया है। इसलिए धर्म का अर्थ केवल नियम नहीं, बल्कि ऐसा कर्म है जो हितकारी फल देता है और साधक को शास्त्रसम्मत मार्ग पर धारण करता है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 58, श्लोक 11-13
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