प्राणायाम से मन, वचन और कर्म के दोष कैसे मिटते हैं का सबसे सीधा सार यह है: सतत अभ्यास से प्राणायाम मन, वचन और कर्म से उत्पन्न दोषों को नष्ट करता है और देह की रक्षा करता है।
प्राणायाम जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 8, PDF पृष्ठ 47, श्लोक 55-57 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।
इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।
•उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 8, PDF पृष्ठ 47, श्लोक 55-57 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।
•प्राणायाम श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।
•यदि विस्तृत विधि या पृष्ठभूमि चाहिए, तो नीचे दिए गए लेख पहले खोलें।