विस्तृत उत्तर
प्राणायाम से मन, वचन और कर्म के दोष सतत अभ्यास द्वारा मिटते हैं। पाठ में कहा गया है कि जो पुरुष योगपूर्वक अभ्यास करता है, उसके चित्त में व्यसन उत्पन्न नहीं होता। लगातार अभ्यास करने पर प्राणायाम उस योगी के मन, वचन और कर्म से उत्पन्न सभी दोषों को नष्ट कर देता है। उसी प्राणायाम से बुद्धिमान योगी की देह की भलीभाँति रक्षा भी होती है और श्वास-प्रश्वास की गति घटती जाती है।
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