विस्तृत उत्तर
कर्म सिद्धांत हिंदू धर्म का केंद्रीय और मूलभूत सिद्धांत है। 'कर्म' शब्द का अर्थ है 'क्रिया'।
मूल सिद्धांत
प्रत्येक क्रिया — चाहे शारीरिक (कायिक), वाचिक (वाणी) या मानसिक (मन) — एक प्रतिक्रिया (फल) उत्पन्न करती है। यह प्रतिक्रिया तत्काल या भविष्य में (इस जन्म या अगले जन्मों में) प्राप्त हो सकती है।
भगवद्गीता में कर्म
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का उपदेश दिया:
*'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'* (गीता 2.47)
— तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं।
कर्म के प्रकार (गीता अनुसार)
- 1सात्विक कर्म — शास्त्र विधि से, बिना अहंकार, बिना फल की इच्छा — श्रेष्ठ (गीता 18.23)
- 2राजसिक कर्म — अहंकार और फल की इच्छा से — मध्यम (गीता 18.24)
- 3तामसिक कर्म — मोह, आलस्य और अज्ञान से — निकृष्ट (गीता 18.25)
कर्म-बंधन और मोक्ष
- ▸राग-द्वेष से किए गए कर्म बंधनकारी होते हैं — ये जन्म-मृत्यु चक्र में बाँधते हैं।
- ▸निष्काम कर्म (बिना फल की इच्छा) मोक्ष का मार्ग है।
- ▸आत्मज्ञान प्राप्त होने पर कर्म-बंधन समाप्त होता है।
वेदांत दृष्टिकोण
आदि शंकराचार्य (ब्रह्मसूत्र भाष्य III.2.38) के अनुसार कर्म स्वयं फल नहीं दे सकता — एक सर्वोच्च ईश्वर (ईश्वर) कर्मफल का प्रबंधन करता है।
सारांश: कर्म सिद्धांत कहता है — जैसा करोगे, वैसा भोगोगे। यह भाग्यवाद नहीं, पुरुषार्थ का सिद्धांत है — वेद, गीता और उपनिषद तीनों कर्म को कर्तव्य मानते हैं।





