विस्तृत उत्तर
इस प्रश्न पर शास्त्रों और आचार्यों में विभिन्न मत हैं, और यह हिंदू दर्शन का एक गहन विषय है।
तीन प्रकार के प्रारब्ध
- 1मंद प्रारब्ध — हल्का, जिसे पुरुषार्थ (वैदिक उपाय) से बदला जा सकता है।
- 2तीव्र प्रारब्ध — कठिन, जो पुरुषार्थ और संत/गुरु कृपा से टल सकता है या कम हो सकता है।
- 3तीव्रतर (दृढ़) प्रारब्ध — अत्यंत कठोर, जो होकर ही रहता है — इसे भोगना ही पड़ता है।
प्रारब्ध बदलने के पक्ष में
- ▸भगवद्गीता (18.66): *'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज, अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि'* — भगवान की शरण में जाने पर सभी पापों (कर्मों) से मुक्ति।
- ▸भक्तियोग — ईश्वर की कृपा प्रारब्ध को बदल/मिटा सकती है।
- ▸ज्ञानयोग — आत्मज्ञान से कर्म-बंधन समाप्त।
- ▸गुरु कृपा — सद्गुरु की कृपा से प्रारब्ध परिवर्तित हो सकता है।
प्रारब्ध अपरिवर्तनीय के पक्ष में
- ▸कई वेदांती मानते हैं कि प्रारब्ध भोगना ही पड़ता है — भगवान राम और कृष्ण ने भी प्रारब्ध भोगा।
- ▸'तीव्रतर प्रारब्ध में जो होता है वह होकर ही रहता है।'
समन्वित दृष्टिकोण
प्रारब्ध को पूर्णतः मिटाना कठिन है, परंतु:
- ▸तीव्रता कम की जा सकती है (जैसे तलवार का वार सुई की चुभन बन जाए)।
- ▸समभाव से भोगना — प्रारब्ध को धैर्य और समत्व से भोगने पर वह शीघ्र समाप्त होता है।
- ▸क्रियमाण कर्म पर ध्यान दें — वर्तमान कर्म से भविष्य का प्रारब्ध सुधारें।





