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कर्म सिद्धांत📜 भगवद्गीता (4.5, 3.8), उपनिषद, वेदांत दर्शन2 मिनट पठन

संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म और क्रियमाण कर्म में क्या अंतर है?

संक्षिप्त उत्तर

संचित = सभी जन्मों के कर्मों का भंडार। प्रारब्ध = संचित का वह भाग जो वर्तमान जीवन में फल दे रहा है (भाग्य)। क्रियमाण = वर्तमान में किए जा रहे कर्म (पुरुषार्थ)। क्रियमाण → संचित → प्रारब्ध — यह चक्र मोक्ष तक चलता है।

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विस्तृत उत्तर

समय के आधार पर कर्म तीन प्रकार के होते हैं — संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण।

1संचित कर्म (संग्रहित कर्म)

  • अनेक पूर्व जन्मों से लेकर वर्तमान तक किए गए सभी कर्मों का संचय/भंडार
  • ये अनंत हैं (अनंत जन्मों के कर्म)।
  • गीता में संकेत: *'बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन'* (4.5) — हमारे बहुत जन्म हो चुके हैं।
  • जब तक संचित कर्म शेष हैं, जन्म-मृत्यु चक्र चलता रहता है।

2प्रारब्ध कर्म (भोग्य कर्म)

  • संचित कर्म के भंडार में से वह छोटा हिस्सा जो पककर वर्तमान जीवन में फल देने के लिए तैयार हो गया है।
  • यही वर्तमान जीवन की योनि, परिवार, सुख-दुख निर्धारित करता है।
  • प्रारब्ध को भोगे बिना समाप्त नहीं किया जा सकता — इसे 'भाग्य' भी कहते हैं।
  • तुलसीदास: *'हमारे शरीर के अस्तित्व में आने से बहुत पहले ही हमारी नियति आकार ग्रहण कर लेती है।'*

3क्रियमाण कर्म (वर्तमान कर्म)

  • वर्तमान जीवन में किए जा रहे सभी कर्म — सोचना, बोलना, करना।
  • इन पर मनुष्य का स्वतंत्र अधिकार है — विवेक और पुरुषार्थ से इन्हें शुभ दिशा में मोड़ सकते हैं।
  • ये कर्म संचित कर्म में जमा होते रहते हैं और भविष्य (इस या अगले जन्म) में प्रारब्ध बनकर फल देते हैं।

संबंध

संचित → (एक भाग पकता है) → प्रारब्ध (वर्तमान जीवन में भोगना)

क्रियमाण (वर्तमान कर्म) → संचित में जमा → भविष्य का प्रारब्ध

मोक्ष: जब संचित कर्म पूर्णतः समाप्त, प्रारब्ध भोग लिया, और क्रियमाण कर्म निष्काम हो — तब मोक्ष प्राप्त होता है।

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शास्त्रीय स्रोत
भगवद्गीता (4.5, 3.8), उपनिषद, वेदांत दर्शन
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