विस्तृत उत्तर
समय के आधार पर कर्म तीन प्रकार के होते हैं — संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण।
1संचित कर्म (संग्रहित कर्म)
- ▸अनेक पूर्व जन्मों से लेकर वर्तमान तक किए गए सभी कर्मों का संचय/भंडार।
- ▸ये अनंत हैं (अनंत जन्मों के कर्म)।
- ▸गीता में संकेत: *'बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन'* (4.5) — हमारे बहुत जन्म हो चुके हैं।
- ▸जब तक संचित कर्म शेष हैं, जन्म-मृत्यु चक्र चलता रहता है।
2प्रारब्ध कर्म (भोग्य कर्म)
- ▸संचित कर्म के भंडार में से वह छोटा हिस्सा जो पककर वर्तमान जीवन में फल देने के लिए तैयार हो गया है।
- ▸यही वर्तमान जीवन की योनि, परिवार, सुख-दुख निर्धारित करता है।
- ▸प्रारब्ध को भोगे बिना समाप्त नहीं किया जा सकता — इसे 'भाग्य' भी कहते हैं।
- ▸तुलसीदास: *'हमारे शरीर के अस्तित्व में आने से बहुत पहले ही हमारी नियति आकार ग्रहण कर लेती है।'*
3क्रियमाण कर्म (वर्तमान कर्म)
- ▸वर्तमान जीवन में किए जा रहे सभी कर्म — सोचना, बोलना, करना।
- ▸इन पर मनुष्य का स्वतंत्र अधिकार है — विवेक और पुरुषार्थ से इन्हें शुभ दिशा में मोड़ सकते हैं।
- ▸ये कर्म संचित कर्म में जमा होते रहते हैं और भविष्य (इस या अगले जन्म) में प्रारब्ध बनकर फल देते हैं।
संबंध
संचित → (एक भाग पकता है) → प्रारब्ध (वर्तमान जीवन में भोगना)
क्रियमाण (वर्तमान कर्म) → संचित में जमा → भविष्य का प्रारब्ध
मोक्ष: जब संचित कर्म पूर्णतः समाप्त, प्रारब्ध भोग लिया, और क्रियमाण कर्म निष्काम हो — तब मोक्ष प्राप्त होता है।



