विस्तृत उत्तर
हाँ — ज्योतिष+वेदांत दोनों अनुसार।
शास्त्रीय आधार: जन्म कुंडली = प्रारब्ध कर्म (पूर्व जन्म के संचित कर्मों का वह भाग जो इस जन्म में फलित)। ग्रह स्थिति = प्रारब्ध कर्मों का ज्योतिषीय चित्र।
3 प्रकार कर्म: 1. संचित = सभी जन्मों के कुल कर्म। 2. प्रारब्ध = इस जन्म में फलित होने वाला भाग (= कुंडली)। 3. क्रियमाण = वर्तमान कर्म (= भविष्य बदल सकता)।
आशा का संदेश: प्रारब्ध (कुंडली) = अपरिवर्तनीय नहीं। क्रियमाण कर्म (वर्तमान मेहनत/भक्ति/सेवा) = प्रारब्ध को कम/बदल सकता। गीता (6.5): *'उद्धरेदात्मनात्मानं'* — अपना उद्धार स्वयं करो।
मंत्र/दान/सेवा = क्रियमाण कर्म = प्रारब्ध (ग्रह दोष) कमजोर करता।
सार: कुंडली = संकेत, निर्णय नहीं। पूर्व कर्म = शुरुआती बिंदु, वर्तमान कर्म = गंतव्य बदलने की शक्ति।





