विस्तृत उत्तर
प्रायश्चित्त = साधना/पूजा में त्रुटि/अपराध का निवारण:
कब करें
- 1मंत्र उच्चारण गलत: शुद्ध उच्चारण → प्रायश्चित्त जप (11/108 बार अतिरिक्त)।
- 2अनुष्ठान भंग: व्रत/नियम टूटे (ब्रह्मचर्य/आहार) → प्रायश्चित्त हवन।
- 3अशुद्धि: जप/पूजा में अशुद्ध अवस्था → शुद्धि + प्रायश्चित्त।
- 4अनुष्ठान अधूरा: संकल्प पूर्ण न हो → प्रायश्चित्त + पुनः अनुष्ठान।
- 5षट्कर्म दुरुपयोग: तामसिक कर्म किया → प्रायश्चित्त = गुरु निर्देश।
- 6प्रत्येक पूजा अंत: 'मंत्रहीनं क्रियाहीनं...' = नियमित प्रायश्चित्त।
विधि: गायत्री 1008 जप, या मूल मंत्र 108 अतिरिक्त, या हवन (108 आहुति), या ब्राह्मण भोजन/दान।
सार: 'गलती हो = प्रायश्चित्त → शुद्ध → आगे।' ईश्वर = क्षमाशील।
