विस्तृत उत्तर
श्मशान भस्म तांत्रिक परम्परा में विशेष स्थान रखती है। भगवान शिव स्वयं श्मशानवासी हैं और भस्म धारण करते हैं।
शास्त्रीय आधार
- 1शिव और भस्म: शिव पुराण में शिव को 'भस्मधारी' कहा गया है। भस्म = वैराग्य का प्रतीक — सब कुछ अंततः भस्म होता है। शिव भस्म लगाकर संसार की नश्वरता का स्मरण कराते हैं।
- 1तांत्रिक प्रयोग: उन्नत तांत्रिक साधनाओं (विशेषतः वामाचार/अघोर परम्परा) में श्मशान भस्म का प्रयोग शरीर पर लेपन, मंत्र अभिमंत्रण, और विशेष अनुष्ठानों में होता है। यह भय निवारण, मृत्यु भय पर विजय, और परम वैराग्य की साधना से जुड़ा है।
- 1आध्यात्मिक अर्थ: श्मशान भस्म = मृत्यु बोध। जो साधक मृत्यु से भयमुक्त हो जाता है, वह सर्वोच्च साधक है। 'मरण भय से मुक्ति = जीवन का पूर्ण आनन्द।'
महत्वपूर्ण सावधानी
- ▸श्मशान भस्म साधना = अत्यंत उन्नत तांत्रिक साधना — गुरु दीक्षा अनिवार्य।
- ▸बिना अधिकार और दीक्षा के यह साधना अत्यंत खतरनाक मानी गई है।
- ▸सामान्य गृहस्थ भक्तों के लिए यज्ञ/हवन की भस्म (विभूति) पर्याप्त और सुरक्षित है।
- ▸श्मशान भस्म का प्रयोग जनसामान्य के लिए नहीं — यह विशिष्ट अघोर/कापालिक/नाथ परम्परा का अंग है।
सात्त्विक विकल्प: गोमय (गोबर) भस्म, यज्ञ भस्म, विभूति = सामान्य शिव भक्तों के लिए उत्तम। त्रिपुण्ड्र लगाएँ। शिव कृपा भस्म के प्रकार से नहीं, भक्ति की शुद्धता से मिलती है।



