कपालीश भैरव की उपासना -
1.1 स्फटिक वर्ण ध्यान (बृहत् तंत्रसार एवं अष्टभैरव ध्यान स्तोत्र)
वन्दे बालं स्फटिकसदृशं कुम्भलोल्लासिवक्त्रं
दिव्याकल्पैफणिमणिमयैकिङ्किणीनूपुरञ्च ।
दिव्याकारं विशदवदनं सुप्रसन्नं द्विनेत्रं
हस्ताद्यां वा दधानान्त्रिशिवमनिभयं वक्रदण्डौ कपालम् ॥
हिन्दी भावार्थ एवं विश्लेषण:
- वन्दे बालं स्फटिकसदृशं: "मैं उस भैरव की वंदना करता हूँ जो बाल रूप (बालक के समान) हैं और स्फटिक मणि के समान श्वेत और पारदर्शी हैं।" यहाँ 'बाल' रूप उनकी निश्छलता और 'अतिवर्णाश्रम' (वर्ण और आश्रम से परे) स्थिति को दर्शाता है। स्फटिक वर्ण यह संकेत देता है कि वे त्रिगुणों से अतीत और शुद्ध चैतन्य स्वरूप हैं।
- कुम्भलोल्लासिवक्त्रं: उनका मुख अत्यंत तेजस्वी और उल्लास से भरा है।
- फणिमणिमयै: वे सर्पों (फणि) और मणियों के दिव्य आभूषणों से अलंकृत हैं। सर्प कुण्डलिनी शक्ति और काल (समय) पर उनके नियंत्रण का सूचक हैं।
- किङ्किणीनूपुरञ्च: उनके पैरों में छोटी घंटियों (किङ्किणी) वाले नूपुर सुशोभित हैं, जिसकी ध्वनि नाद-ब्रह्म का प्रतीक है।
- वक्रदण्डौ कपालम्: वे अपने हाथों में वक्रदण्ड (टेढ़ा डंडा, जो संभवतः मेरुदण्ड का प्रतीक है) और कपाल (खोपड़ी) धारण करते हैं। कपाल यहाँ रिक्तता और ग्रहणशीलता का पात्र है।
1.2 स्वर्ण वर्ण ध्यान (मातृका-भैरव संबंध)
एक अन्य परंपरा में, जहाँ कपालीश भैरव को इन्द्राणी मातृका के साथ युगल रूप में पूजा जाता है, उनका वर्ण 'स्वर्ण' (सोने जैसा) बताया गया है और उनका वाहन 'गज' (हाथी) है। यह स्वरूप भौतिक ऐश्वर्य और राजसी शक्ति का प्रतीक है।
कपालो हस्तिवाहनः इन्द्राणी मातृकापतिः ।
स्वर्ण वर्णो महातेजाः वायव्यदिक् सुरक्षकः ॥
हिन्दी भावार्थ एवं विश्लेषण:
- हस्तिवाहनः: "जिनका वाहन हाथी है।" यह कपालीश को इन्द्र (पूर्व दिशा के स्वामी) और उनकी शक्ति इन्द्राणी से जोड़ता है। हाथी स्थिरता, बुद्धिमत्ता और शक्ति का प्रतीक है।
- इन्द्राणी मातृकापतिः: "इन्द्राणी मातृका के पति/स्वामी।" तंत्र में प्रत्येक भैरव एक मातृका (शक्ति) के साथ जुड़ा है। कपालीश की शक्ति इन्द्राणी है, जो ऐन्द्रिक शक्ति (इन्द्रियों पर नियंत्रण) की अधिष्ठात्री है।
- स्वर्ण वर्णो: "स्वर्ण रंग वाले।" यह रूप पुष्टि, धन और यश प्रदान करने वाला है।
- वायव्यदिक् सुरक्षकः: "वायव्य दिशा (उत्तर-पश्चिम) के संरक्षक।"
इन दोनों ध्यान स्वरूपों का तुलनात्मक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि साधक अपनी कामना के अनुसार कपालीश का ध्यान कर सकता है—मोक्ष और आत्म-शुद्धि के लिए 'स्फटिक' रूप, और भोग एवं ऐश्वर्य के लिए 'स्वर्ण' रूप।
1. कपालीश भैरव के प्रामाणिक मंत्र
इस खंड में मंत्र महोदधि और अन्य तंत्र ग्रंथों से उद्धृत कपालीश भैरव के प्रामाणिक मंत्रों का संकलन किया गया है। इन मंत्रों का उच्चारण और विनियोग अत्यंत सावधानी और श्रद्धा के साथ किया जाना चाहिए।
1.1 अष्टभैरव अंतर्गत मूल मंत्र
मंत्र महोदधि और बृहत् तंत्रसार के अनुसार, कपालीश भैरव का मूल मंत्र विभिन्न बीजाक्षरों के संयोजन से बना है। यह मंत्र सर्वाधिक प्रभावशाली माना जाता है।
मंत्रार्थ एवं बीजाक्षर विश्लेषण:
- ॐ (प्रणव): परब्रह्म का प्रतीक, मंत्र का प्राण।
- ह्रीं (माया बीज/भुवनेश्वरी बीज): यह बीज मंत्र सृष्टि की उत्पत्ति और शक्ति का प्रतीक है। भैरव साधना में 'ह्रीं' का प्रयोग साधक को माया के बंधनों को काटकर उसके स्वामी (ईश्वर) तक पहुँचने में सहायता करता है। यह कपालीश की आकर्षण शक्ति को भी जागृत करता है।
- क्रीं (काली बीज): यह अत्यंत शक्तिशाली बीज है जो परिवर्तन, क्रिया और अज्ञान के विनाश का सूचक है। कपालीश के संदर्भ में, 'क्रीं' कपाल (मस्तिष्क/अहंकार) में जमी हुई जड़ता को तोड़ता है।
- श्रीं (लक्ष्मी बीज): यह बीज ऐश्वर्य, समृद्धि और सौंदर्य का प्रतीक है। चूँकि कपालीश का एक रूप 'स्वर्ण वर्ण' है, अतः 'श्रीं' बीज उनकी धन-धान्य प्रदायिनी शक्ति को सक्रिय करता है।
- कपालभैरवाय: देवता का नाम, जिसका अर्थ है 'कपाल धारण करने वाले भयानक रक्षक'।
- नमः: समर्पण भाव।
1.1 विशेष अष्टभैरव आवाहन मंत्र
जब कपालीश भैरव का आवाहन अष्टभैरव मंडल के अंतर्गत किया जाता है, तो एक विशिष्ट मंत्र का प्रयोग होता है जिसमें उनके तत्त्व का समावेश होता है।
विश्लेषण:
जुं सः (मृत्युंजय बीज): यह बीज भगवान शिव के मृत्युंजय स्वरूप से संबंधित है। कपालीश, जो स्वयं ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हुए, साधक को अकाल मृत्यु और भय से मुक्ति दिलाते हैं।
भं (भैरव बीज): यह भैरव का विशिष्ट बीज है।
फट् (अस्त्र बीज): यह विघ्नों को तोड़ने और नकारात्मक शक्तियों को दूर करने के लिए प्रयुक्त होता है।
1.2 हवन एवं उग्र प्रयोग मंत्र
शत्रु बाधा निवारण, कृत्या निवारण और तीव्र शुद्धिकरण के लिए हवन (होम) में प्रयुक्त होने वाले मंत्र 'स्वाहा' के साथ उच्चारित होते हैं। शाक्त प्रमोद और अन्य ग्रंथों में इनके विभिन्न रूप मिलते हैं।
मंत्र (सात्विक/राजसिक प्रयोग):
मंत्र (तामसिक/तीव्र प्रयोग):
'गं' बीज का रहस्य: यहाँ 'गं' बीज का प्रयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सामान्यतः यह गणेश बीज है, जो विघ्न-विनाशक है। कपालीश साधना में इसका प्रयोग यह सुनिश्चित करता है कि 'फट्' जैसे उग्र बीज का प्रयोग साधक के जीवन में अस्थिरता न लाए, बल्कि गणेश जी की तरह मार्ग की बाधाओं को सौम्यता से हटा दे।
1. कपालीश गायत्री मंत्र
देवता के तत्त्व का चिंतन करने के लिए गायत्री मंत्र का प्रयोग किया जाता है। यद्यपि भैरव गायत्री सर्वविदित है, कपालीश के लिए विशिष्ट गायत्री का निर्माण शास्त्रों के आधार पर इस प्रकार किया जाता है: