रक्ता : मंत्र एवं उपासना
1.1 षोडशाक्षर मंत्र (सोलह अक्षरों का विद्या)
यह मंत्र अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है और परंपरा के अनुसार, इसका अनुष्ठान भगवान राम के भाई भरत ने किया था। जब राम वनवास में थे, तब भरत ने नंदीग्राम में इसी विद्या के माध्यम से राज्य की रक्षा और राम की वापसी सुनिश्चित की थी।
बीज विश्लेषण:
- क्रीं: यह काली का आद्य बीज है। 'क' से काली (शक्ति), 'र' से ब्रह्म (प्रकाश), 'ई' से महामाया, और 'नाद' (अनुस्वार) से दुख हरण। तीन बार प्रयोग (क्रीं क्रीं क्रीं) इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति के संतुलन का प्रतीक है।
- हूं: यह कूर्म बीज या क्रोध बीज है। यह नकारात्मक शक्तियों का स्तम्भन करता है और साधक के चारों ओर सुरक्षा कवच का निर्माण करता है।
- ह्रीं: यह माया बीज या भुवनेश्वरी बीज है। यह सृष्टि के संचालन और ऐश्वर्य का प्रतीक है। 'रक्ता' स्वरूप (जो स्थिति/पालन से जुड़ा है) के लिए ह्रीं बीज अनिवार्य है।
1.2. चतुर्दशाक्षर मंत्र (चौदह अक्षरों का विद्या)
यह मंत्र भी गुह्यकाली की उपासना में प्रमुखता से प्रयुक्त होता है। कुछ परंपराओं में इसे राम द्वारा उपासित विद्या का भेद माना जाता है।
1.3 नवाक्षर मंत्र (नौ अक्षरों का लघु मंत्र)
दैनिक उपासना और मानस जाप के लिए यह मंत्र अत्यंत उपयुक्त माना गया है।
महावज्रेश्वरी रक्ता देवी: प्रामाणिक मंत्र
शाब्दिक और तांत्रिक अर्थ:
महावज्रेश्वरी: 'वज्र' का अर्थ तंत्र में हीरा (अभेद्यता) और नाड़ी विशेष (वज्रा नाड़ी) दोनों होता है। वज्रेश्वरी वह देवी हैं जो सुषुम्ना के भीतर वज्रा नाड़ी में निवास करती हैं और कुंडलिनी शक्ति के प्रवाह को नियंत्रित करती हैं।
रक्ता देवी (Rakta Devi): 'रक्त' यहाँ उनके स्वरूप और उनकी कार्यप्रणाली को दर्शाता है। शोध सामग्री में उन्हें (संवेदनशील/कामुक देवी) कहा गया है। तांत्रिक संदर्भ में, का अर्थ अश्लील नहीं, अपितु 'समस्त संवेदनाओं और रसों की अधिष्ठात्री' है। वे साधक को दिव्य आनंद प्रदान करती हैं।
1.1 अन्य संबंधित 'रक्त' योगिनियां
रुद्रयामल तंत्र की 64 योगिनी नामावली में केवल रक्ता देवी ही नहीं, अपितु कई अन्य योगिनियां भी हैं जिनके नाम में 'रक्त' शब्द आता है। यह दर्शाता है कि 'रक्त' शक्ति का एक व्यापक आयाम है।
| क्र.सं. | योगिनी नाम | मंत्र | विशेषता |
|---|---|---|---|
| १ | विप्रचित्ता रक्त प्रिया | ॐ विप्रचित्ता रक्त प्रियाये स्वाहा। | जो रक्त (खून या लाल रंग/जपाकुसुम) प्रिय है। |
| २ | उग्र रक्त भोग रूपा | ॐ उग्र रक्त भोग रूपाये स्वाहा। | जो उग्र हैं और रक्त का भोग (आनंद) लेती हैं। |
| ३ | दीपा मुक्तिः रक्त देहा | ॐ दीपा मुक्तिः रक्त देहाये स्वाहा। | जिनका शरीर (देह) रक्त वर्ण का है और जो मुक्ति प्रदायिनी हैं। |
| ४ | नील भुक्ति रक्त स्पर्शा | ॐ नील भुक्ति रक्त स्पर्शाये स्वाहा। | जो नील वर्ण का भोग और रक्त वर्ण का स्पर्श करती हैं। |
| ५ | चित्रा देवी रक्त पूजा | ॐ चित्रा देवी रक्त पूजाये स्वाहा। | जिनकी पूजा रक्त (लाल) उपचारों से होती है। |
विश्लेषण:
ये मंत्र स्पष्ट करते हैं कि 'रक्ता' योगिनी समूह का संबंध रक्त धातु, लाल रंग, जपाकुसुम (गुड़हल), और तेजस तत्व से है। साधना में इन देवियों को लाल चंदन, लाल वस्त्र, सिन्दूर और लाल पुष्प (विशेषकर गुड़हल) अर्पित करने का विधान रुद्रयामल में मिलता है।
रक्त चामुंडा और रक्तदंतिका
1.1 रक्त चामुंडा: शत्रु विनाशिनी
चामुंडा देवी का वह स्वरूप जो रक्तपान करता है और शत्रुओं का पूर्ण विनाश करता है, 'रक्त चामुंडा' कहलाता है।
मंत्र का अर्थ:
- ह्रीं: माया/शक्ति बीज।
- फट्: अस्त्र बीज, जो बंधनों को काटता है और प्रहार करता है।
- रक्त-चामुण्डेश्वरी: लाल वर्ण वाली चामुंडा देवी।
- शत्रुजीवितानाशिनी: शत्रुओं के जीवन का नाश करने वाली।
- एह्येहि: आओ, आओ (आवाहन)।
- इष्टान् आकर्षय: अभीष्ट (इच्छित) वस्तुओं या लक्ष्यों को आकर्षित करो।
ध्यान:
तंत्रसार और वराह पुराण के अनुसार, रक्त चामुंडा का ध्यान अत्यंत उग्र है। वे शव पर आरूढ़ हैं (शवासनस्थ), उनका शरीर लाल है, वे खड्ग और पात्र (रक्तपात्र) धारण करती हैं, और मुण्डमाला से विभूषित हैं।
आख्याता रक्त-चामुण्डा देवी योगेश्वरीति च ॥
अर्थात, जो खड्ग, पात्र, मूसल और हल धारण करती हैं, वे रक्त चामुंडा और योगेश्वरी देवी कहलाती हैं। यह स्वरूप दुर्गा सप्तशती के उस प्रसंग से भी मेल खाता है जहाँ चामुंडा ने चण्ड और मुण्ड का वध किया था।