विस्तृत उत्तर
तंत्र में पूर्णिमा और अमावस्या दोनों साधना हेतु अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं, किन्तु दोनों की प्रकृति भिन्न है।
पूर्णिमा साधना (सौम्य/सात्विक)
- ▸चन्द्रमा पूर्ण = प्रकाश, ज्ञान, शान्ति, पोषण।
- ▸सात्विक/दक्षिणाचार साधना हेतु उत्तम।
- ▸देवता: विष्णु, लक्ष्मी, सरस्वती, गुरु, सोम (चन्द्र)।
- ▸शान्ति कर्म, पुष्टि कर्म, वशीकरण (सौम्य)।
- ▸ज्ञान प्राप्ति, बुद्धि वृद्धि, मानसिक शान्ति।
- ▸गुरु पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा, बुद्ध पूर्णिमा = विशेष।
अमावस्या साधना (उग्र/तामसिक)
- ▸चन्द्रमा अदृश्य = अन्धकार, गोपनीयता, शक्ति का गुप्त रूप।
- ▸उग्र/वामाचार/तामसिक साधना हेतु उत्तम।
- ▸देवता: काली, भैरव, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी।
- ▸मारण, उच्चाटन, स्तम्भन, विद्वेषण (षट्कर्म के उग्र रूप)।
- ▸पितृ तर्पण/श्राद्ध भी अमावस्या पर।
- ▸दीपावली (कार्तिक अमावस्या) = तंत्र साधना की सबसे शक्तिशाली रात्रि।
संक्षिप्त भेद
- ▸पूर्णिमा = प्रकाश, सात्विक, शान्ति, ज्ञान, पोषण।
- ▸अमावस्या = अन्धकार, तामसिक, शक्ति, गोपनीय, उग्र।
- ▸पूर्णिमा = सभी साधक। अमावस्या = उन्नत/दीक्षित साधक।
ध्यान दें: दोनों में सात्विक साधना (जप, ध्यान, भक्ति) सम्भव और शुभ है। उग्र/हानिकारक प्रयोग (मारण, उच्चाटन) निषेध — ये केवल ज्ञानार्थ बताए गए हैं।




