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तंत्र साधना📜 कुलार्णव तंत्र, शारदा तिलक, विज्ञान भैरव तंत्र, योग कुण्डलिनी उपनिषद्2 मिनट पठन

तंत्र में शरीर को देवालय कैसे बनाएं

संक्षिप्त उत्तर

शरीर = देवालय (कुलार्णव तंत्र: 'देहो देवालयः')। विधि: (1) न्यास — शरीर पर मंत्र आरोपण (कर/अंग/मातृका)। (2) भूतशुद्धि — पंचतत्व शुद्धि (लं/वं/रं/यं/हं)। (3) चक्र जागृति — 7 चक्र = 7 कक्ष, कुण्डलिनी ऊर्ध्वगमन। (4) प्राणायाम + बन्ध। (5) सात्विक आहार-विहार। गुरु दीक्षा अनिवार्य।

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विस्तृत उत्तर

तंत्र दर्शन में शरीर को 'देवालय' (देवता का मन्दिर) माना गया है। 'तन्' (शरीर) + 'त्र' (विस्तार) = तंत्र — शरीर के माध्यम से चेतना का विस्तार। कुलार्णव तंत्र: 'देहो देवालयः प्रोक्तो जीवो देवः सनातनः' — यह शरीर देवालय है और जीवात्मा सनातन देव है।

शरीर को देवालय बनाने की विधि

1न्यास (मंत्र आरोपण)

न्यास = शरीर के विभिन्न अंगों पर मंत्रों का स्पर्शपूर्वक आरोपण। इससे शरीर के प्रत्येक अंग में दैवी शक्ति स्थापित होती है।

  • कर न्यास: हाथ की उँगलियों पर बीज मंत्र।
  • अंग न्यास: हृदय, शिर, शिखा, कवच (कन्धे), नेत्र, अस्त्र (करतल) पर मंत्र।
  • मातृका न्यास: वर्णमाला के अक्षरों (अ से ह तक) को शरीर के विभिन्न स्थानों पर स्थापित।
  • षड्अंग न्यास: छह अंगों पर।

2भूतशुद्धि (पंचतत्व शुद्धि)

शरीर पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बना है। भूतशुद्धि में इन तत्वों को क्रमशः विलीन कर शुद्ध किया जाता है। प्रत्येक तत्व का बीज मंत्र (लं, वं, रं, यं, हं) जपकर सम्बन्धित चक्र पर ध्यान।

3चक्र जागृति

शरीर में 7 प्रमुख चक्र = 7 ऊर्जा केन्द्र = देवालय के 7 कक्ष। मूलाधार (लं) → स्वाधिष्ठान (वं) → मणिपूर (रं) → अनाहत (यं) → विशुद्ध (हं) → आज्ञा (ॐ) → सहस्रार। कुण्डलिनी जागरण = शक्ति का मूलाधार से सहस्रार तक यात्रा = देवालय में देव दर्शन।

4प्राणायाम और बन्ध

प्राणशक्ति का नियन्त्रण — मूलबन्ध, उड्डियान बन्ध, जालन्धर बन्ध = शरीर की ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी बनाना।

5आहार-विहार शुद्धि

सात्विक आहार, ब्रह्मचर्य, इन्द्रिय संयम = मन्दिर की स्वच्छता।

सारांश: न्यास से शरीर को मंत्रमय बनाएँ, भूतशुद्धि से पवित्र करें, चक्र जागृति से ऊर्जा केन्द्र सक्रिय करें — तब शरीर = जीवित देवालय।

महत्वपूर्ण: ये उन्नत साधनाएँ हैं — गुरु दीक्षा और मार्गदर्शन अनिवार्य।

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शास्त्रीय स्रोत
कुलार्णव तंत्र, शारदा तिलक, विज्ञान भैरव तंत्र, योग कुण्डलिनी उपनिषद्
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