सनातन धर्म एवं तांत्रिक परंपरा में दंतुरा (दूती देवी): एक विस्तृत शास्त्रीय एवं मंत्र-शास्त्रीय महा-अन्वेषण
1.1 ब्रह्मयामल तंत्रोक्त दूती-चतुष्टय मंत्र
ब्रह्मयामल तंत्र में चारों दूतियों की एक साथ उपासना का विधान है। उनके सामूहिक और व्यष्टि मंत्रों का निर्माण मूल विद्या से ही होता है।
1. दंतुरा एकाक्षर मंत्र:
2. दंतुरा मूल मंत्र (पूर्ण विधान):
ब्रह्मयामल की पद्धति के अनुसार, बीज मंत्र को नाम और स्वाहाकार के साथ संयोजित किया जाता है।
3. चतुर्दुती मंत्र :
साधक जब मंडल पूजा करता है, तो चारों दूतियों को एक सूत्र में पूजता है। तंत्रालोक और ब्रह्मयामल के समन्वय से यह मंत्र बनता है:
2.1 अग्निपुराणोक्त चामुंडा-अंग मंत्र
अग्निपुराण में मातृकाओं और उनकी शक्तियों के न्यास और पूजा का वर्णन है। यहाँ दंतुरा को चामुंडा के परिवार में नैऋत्य कोण में स्थापित किया जाता है।
मंत्र:
यह मंत्र तर्पण और अर्चन के लिए है। अग्निपुराण में शत्रु-स्तंभन के प्रसंग में दंतुरा का आवाहन किया जाता है।