विस्तृत उत्तर
दान की महिमा सभी शास्त्रों में है — 'दानात् मोक्षः', 'दान ही परम धर्म'। फिर भी दान के बावजूद दरिद्रता हो तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
दान के फल न मिलने के कारण:
प्रारब्ध कर्म — यदि पिछले कर्मों में धन का दुरुपयोग, दूसरों का हक दबाना या कृपणता रही हो — तो वह ऋण चुकाने में समय लगता है। दान उस प्रक्रिया को तेज करता है पर रातोंरात नहीं बदलता।
दान का भाव — दान यदि दिखावे के लिए हो, प्रसिद्धि के लिए हो — तो वह 'राजसिक दान' है जिसका फल सीमित है। 'सात्विक दान' वह है जो बिना अपेक्षा, बिना प्रचार के, योग्य पात्र को दिया जाए।
पात्र — गीता में 'पात्र दान' का उल्लेख है। सही पात्र को दान देने से फल अधिक मिलता है।
दान और कमाई का संतुलन — केवल दान से दरिद्रता नहीं जाती — साथ में सही परिश्रम और योजना भी आवश्यक है। भगवान ने मनुष्य को कर्म करने का सामर्थ्य दिया है।
गीता का सात्विक दान — 'देश काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ।' (17.20) — सही देश, सही समय और सही पात्र को जो दिया जाए वह सात्विक दान है।
अन्य कारण — क्या परिवार में कोई ऐसा बर्ताव है जो धन को रोक रहा हो? क्या पैसे की बर्बादी हो रही है? दान के साथ जीवन में अनुशासन भी जरूरी है।





