विस्तृत उत्तर
भागवत सप्ताह के बाद दान का विधान कई रूपों में है। कथा पूरी होने पर जय-जयकार, नमस्कार और शंखध्वनि के साथ ब्राह्मणों और याचकों को धन और अन्न देने को कहा गया है। यदि हवन करने की शक्ति न हो, तो हवन का फल पाने के लिये ब्राह्मण को हवन सामग्री दान करनी चाहिए। फिर बारह ब्राह्मणों को खीर, मधु आदि उत्तम पदार्थ खिलाने और व्रतपूर्ति के लिये गौ तथा सुवर्ण दान करने का निर्देश है। यदि सामर्थ्य हो तो तीन तोले सोने का सिंहासन बनाकर उस पर सुंदर लिखी हुई भागवत पुस्तक रखे, उसकी पूजा करे और संयमी आचार्य को वस्त्र, आभूषण, गंध और दक्षिणा सहित समर्पित करे।
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