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शास्त्र ज्ञान📜 मुण्डकोपनिषद 1/2/12-13, छान्दोग्य 6/14/2, कठोपनिषद 1/2/7-9, तैत्तिरीय 1/11, श्वेताश्वतर 6/232 मिनट पठन

उपनिषद में गुरु का महत्व क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

उपनिषदों में गुरु अनिवार्य है। मुण्डकोपनिषद (1/2/12) में श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाने का आदेश है। छान्दोग्य (6/14/2) में गुरु 'अंधे को मार्ग दिखाने वाला' है। श्वेताश्वतर (6/23) — ईश्वर और गुरु में समान भक्ति से ही उपनिषद-ज्ञान प्रकट होता है।

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विस्तृत उत्तर

## उपनिषद में गुरु का महत्व

उपनिषदों में गुरु — अनिवार्य माध्यम

उपनिषदों में बार-बार स्पष्ट किया गया है कि बिना सद्गुरु के आत्मज्ञान संभव नहीं। गुरु केवल शिक्षक नहीं — वह स्वयं ब्रह्म का प्रतिनिधि है।

मुण्डकोपनिषद (1/2/12-13) — गुरु की योग्यता

*'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्।'*

— ब्रह्म-ज्ञान के लिए हाथ में समिधा लेकर ऐसे गुरु के पास जाओ जो:

  1. 1श्रोत्रिय — वेदों में पारंगत
  2. 2ब्रह्मनिष्ठ — स्वयं ब्रह्म में स्थित

गुरु के पास जाकर — *'तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय।'* — प्रशांत और शम-सम्पन्न शिष्य को गुरु परब्रह्म का ज्ञान देते हैं।

छान्दोग्य उपनिषद (6/14/2) — गुरु का रूपक

*'तद्यथाऽन्धेन पुरुषेण...'*

— जैसे अंधे व्यक्ति को किसी ने गांधार से दूर जंगल में छोड़ दिया — वह बिना मार्गदर्शक के न जा सकता। गुरु वह मार्गदर्शक है जो शिष्य को भटकाव से निकालकर 'गांधार' (मुक्ति) तक पहुँचाता है।

कठोपनिषद (1/2/7-9) — सद्गुरु की दुर्लभता

*'श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः।'*

— श्रेय (कल्याण) और प्रेय (सुख) दोनों मनुष्य के सामने आते हैं। जो श्रेय को चुनता है, वही गुरु की ओर जाता है। सच्चा गुरु दुर्लभ है और सच्चा शिष्य भी।

श्वेताश्वतर उपनिषद (6/23)

*'यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।'*

— जिसकी परमात्मा में जैसी भक्ति है, वैसी ही गुरु में हो — उसके लिए ही ये उपनिषद-वाक्य प्रकाशित होते हैं।

तैत्तिरीय उपनिषद (1/11) — आचार्य ब्रह्म है

*'आचार्यो ब्रह्म भवति।'*

— आचार्य साक्षात् ब्रह्म का स्वरूप है।

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शास्त्रीय स्रोत
मुण्डकोपनिषद 1/2/12-13, छान्दोग्य 6/14/2, कठोपनिषद 1/2/7-9, तैत्तिरीय 1/11, श्वेताश्वतर 6/23
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