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शास्त्र ज्ञान📜 तैत्तिरीय उपनिषद 2/1, छान्दोग्य 6/2/1, बृहदारण्यक 2/3/6, माण्डूक्योपनिषद 1-2, मुण्डकोपनिषद 2/2/82 मिनट पठन

उपनिषद में परम सत्य क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

उपनिषदों में परम सत्य ब्रह्म है — 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय 2/1)। 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' — यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म है (छान्दोग्य 3/14/1)। 'नेति नेति' — परम सत्य किसी परिभाषा में नहीं बंधता। 'तत्त्वमसि' — वह परम सत्य तू ही है — यह उपनिषदों का सर्वोच्च उद्घोष है।

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विस्तृत उत्तर

## उपनिषद में परम सत्य क्या है?

उपनिषदों में 'परम सत्य' का स्वरूप

उपनिषदों का एकमात्र विषय परम सत्य की खोज है — 'कोऽहम्? कुतोऽयं जगत्? किं ब्रह्म?' — मैं कौन हूँ? यह जगत कहाँ से आया? ब्रह्म क्या है?

तैत्तिरीय उपनिषद (2/1) — परम सत्य की परिभाषा

*'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।'*

— ब्रह्म ही परम सत्य है — वह सत्य है (असत् नहीं), ज्ञान है (जड़ नहीं) और अनंत है (ससीम नहीं)।

छान्दोग्य उपनिषद (6/2/1) — एक ही सत्य

*'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्।'*

— आरंभ में 'सत्' था — एक, अद्वितीय। यह परम सत्य है जिससे सम्पूर्ण सृष्टि प्रकट हुई।

'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छान्दोग्य 3/14/1)

— यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है। दो नहीं, केवल एक — यह अद्वैत का परम सत्य है।

बृहदारण्यक (2/3/6) — सत्य की दो अभिव्यक्तियाँ

  • मूर्त (साकार) — जो रूप-रंग में दिखता है
  • अमूर्त (निराकार) — जो उससे परे है

परम सत्य — वह है जो दोनों से परे, दोनों में व्याप्त — 'सत्यस्य सत्यम्'।

'नेति नेति' — परम सत्य अनिर्वचनीय

बृहदारण्यक (3/9/26) — ब्रह्म को 'यह है' कहकर पूर्णतः नहीं बताया जा सकता, इसलिए 'नेति नेति' — किसी सीमित परिभाषा में बांधे नहीं।

तीन स्तरों का परम सत्य

  1. 1व्यावहारिक सत्य — यह जगत दिखता है — यह व्यावहारिक सत्य है
  2. 2प्रातिभासिक सत्य — स्वप्न में जो दिखा — वह क्षणिक था
  3. 3पारमार्थिक सत्य — ब्रह्म — जो सदा था, है और रहेगा — यही परम सत्य है

महावाक्यों का सार

तत्त्वमसि' — वह परम सत्य (ब्रह्म) तू ही है — यह उपनिषदों का सर्वोच्च और अंतिम उद्घोष है।
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शास्त्रीय स्रोत
तैत्तिरीय उपनिषद 2/1, छान्दोग्य 6/2/1, बृहदारण्यक 2/3/6, माण्डूक्योपनिषद 1-2, मुण्डकोपनिषद 2/2/8
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