विस्तृत उत्तर
## उपनिषद में परम सत्य क्या है?
उपनिषदों में 'परम सत्य' का स्वरूप
उपनिषदों का एकमात्र विषय परम सत्य की खोज है — 'कोऽहम्? कुतोऽयं जगत्? किं ब्रह्म?' — मैं कौन हूँ? यह जगत कहाँ से आया? ब्रह्म क्या है?
तैत्तिरीय उपनिषद (2/1) — परम सत्य की परिभाषा
*'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।'*
— ब्रह्म ही परम सत्य है — वह सत्य है (असत् नहीं), ज्ञान है (जड़ नहीं) और अनंत है (ससीम नहीं)।
छान्दोग्य उपनिषद (6/2/1) — एक ही सत्य
*'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्।'*
— आरंभ में 'सत्' था — एक, अद्वितीय। यह परम सत्य है जिससे सम्पूर्ण सृष्टि प्रकट हुई।
'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छान्दोग्य 3/14/1)
— यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है। दो नहीं, केवल एक — यह अद्वैत का परम सत्य है।
बृहदारण्यक (2/3/6) — सत्य की दो अभिव्यक्तियाँ
- ▸मूर्त (साकार) — जो रूप-रंग में दिखता है
- ▸अमूर्त (निराकार) — जो उससे परे है
परम सत्य — वह है जो दोनों से परे, दोनों में व्याप्त — 'सत्यस्य सत्यम्'।
'नेति नेति' — परम सत्य अनिर्वचनीय
बृहदारण्यक (3/9/26) — ब्रह्म को 'यह है' कहकर पूर्णतः नहीं बताया जा सकता, इसलिए 'नेति नेति' — किसी सीमित परिभाषा में बांधे नहीं।
तीन स्तरों का परम सत्य
- 1व्यावहारिक सत्य — यह जगत दिखता है — यह व्यावहारिक सत्य है
- 2प्रातिभासिक सत्य — स्वप्न में जो दिखा — वह क्षणिक था
- 3पारमार्थिक सत्य — ब्रह्म — जो सदा था, है और रहेगा — यही परम सत्य है
महावाक्यों का सार
तत्त्वमसि' — वह परम सत्य (ब्रह्म) तू ही है — यह उपनिषदों का सर्वोच्च और अंतिम उद्घोष है।





