विस्तृत उत्तर
## उपनिषद में ध्यान का मार्ग
उपनिषदों में ध्यान के तीन प्रमुख मार्ग
### 1. ओम्-उपासना (माण्डूक्योपनिषद)
*'ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत।'*
— ओम् का ध्यान करो। ओम् की चार मात्राएं — अकार (जाग्रत), उकार (स्वप्न), मकार (सुषुप्ति) और तुरीय (निर्ध्वनि) — इन चारों में क्रमशः प्रवेश करना ही ध्यान का मार्ग है।
तुरीय में — न बाहर का बोध, न भीतर का — न दोनों का — न भी नहीं — केवल शुद्ध चेतना। 'अयमात्मा ब्रह्म' — यही ध्यान की परिणति।
### 2. 'नेति नेति' — निराकरण मार्ग (बृहदारण्यक 4/3/32)
*'यो वेद नेति नेति।'*
— जो 'यह नहीं, यह नहीं' करते-करते अंततः जो शेष बचता है — वही ब्रह्म है।
विधि:
- ▸'मैं शरीर नहीं' — इसे भाव में उतारो
- ▸'मैं प्राण नहीं' — इसे भी छोड़ो
- ▸'मैं मन नहीं' — इसे भी छोड़ो
- ▸'मैं बुद्धि नहीं' — इसे भी छोड़ो
- ▸जो शेष रहे — शुद्ध साक्षी-चेतना — वही आत्मा है
### 3. 'सोऽहम्' — प्राण-ध्यान मार्ग
*'अहमस्मि सोऽहमस्मि'*
— श्वास लेते 'सो' (वह ब्रह्म), श्वास छोड़ते 'हम्' (मैं)। प्रत्येक श्वास के साथ ब्रह्म-चेतना का जागरण।
श्वेताश्वतर उपनिषद (2/8-15) — ध्यान के चिन्ह
ध्यान की गहराई बढ़ने पर:
- ▸पहले — धुंध, धुआं, अग्नि, वायु के संकेत
- ▸फिर — सूर्य, चंद्र, तारे का आभास
- ▸अंत में — निर्मल प्रकाश का साक्षात्कार
ध्यान के फल
*'ध्यानयोगानुगृहीतम्।'* (कठोपनिषद 2/24)
— ध्यान-योग से अनुगृहीत साधक को आत्मा स्वयं अपना दर्शन देती है।





