विस्तृत उत्तर
## उपनिषद में ब्रह्मज्ञान क्या है?
ब्रह्मज्ञान की परिभाषा
ब्रह्मज्ञान वह परम अनुभव है जिसमें साधक को प्रत्यक्षतः यह बोध होता है कि 'मैं और ब्रह्म एक हैं।' यह शाब्दिक या बौद्धिक ज्ञान नहीं — यह 'अपरोक्षानुभूति' (direct experience) है।
ब्रह्मज्ञान बनाम सामान्य ज्ञान
| सामान्य ज्ञान (अपरा) | ब्रह्मज्ञान (परा) |
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| वेद, शास्त्र, विज्ञान | आत्म-ब्रह्म एकता का बोध |
| बुद्धि से प्राप्त | अनुभव से प्राप्त |
| परोक्ष (indirect) | अपरोक्ष (direct) |
| संसार में उपयोगी | मोक्ष देने वाला |
चार महावाक्य — ब्रह्मज्ञान के बीज
- 1'प्रज्ञानं ब्रह्म' (ऐतरेय 3/3) — चेतना ही ब्रह्म है
- 2'अहं ब्रह्मास्मि' (बृहदारण्यक 1/4/10) — मैं ब्रह्म हूँ
- 3'तत्त्वमसि' (छान्दोग्य 6/8/7) — वह तू ही है
- 4'अयमात्मा ब्रह्म' (माण्डूक्य 1/2) — यह आत्मा ब्रह्म है
ये महावाक्य श्रवण के समय बीज रूप में हृदय में जाते हैं; मनन से अंकुरित और निदिध्यासन से पूर्ण पुष्पित होते हैं।
ब्रह्मज्ञान का फल (मुण्डकोपनिषद 2/2/8-9)
- ▸हृदय-ग्रंथि टूट जाती है
- ▸सभी संशय नष्ट होते हैं
- ▸समस्त कर्म क्षय होते हैं
- ▸मनुष्य ब्रह्म-स्वरूप हो जाता है
ब्रह्मज्ञान में 'मैं' का स्वरूप-परिवर्तन
बृहदारण्यक (4/4/22) — *'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति।'*
— जो ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है। यहाँ जानना और होना एक ही है।





