विस्तृत उत्तर
भागवत पुस्तक दान का विधान सामर्थ्यवान व्यक्ति के लिये बताया गया है। यदि शक्ति हो तो तीन तोले सोने का सिंहासन बनवाया जाए। उस पर सुंदर अक्षरों में लिखी हुई श्रीमद्भागवत की पुस्तक रखी जाए। फिर आवाहन आदि विविध उपचारों से उसकी पूजा की जाए। इसके बाद संयमी आचार्य को वस्त्र, आभूषण, गंध और दक्षिणा सहित वह पुस्तक समर्पित कर दी जाए। ऐसा करने से बुद्धिमान दाता जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त हो जाता है। यह दान केवल पुस्तक देने का कर्म नहीं है; उसमें भागवत की पूजा, आचार्य का सम्मान, दक्षिणा और समर्पण शामिल हैं। इस प्रकार भागवत पुस्तक दान को मुक्ति-साधन के रूप में बताया गया है।
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