अनन्त चतुर्दशी एवं अनन्त-व्रत: एक विस्तृत शास्त्रीय, पुराणीय एवं धर्मशास्त्रीय शोध प्रतिवेदन
प्रस्तावना: अनन्त तत्त्व एवं भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी का आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य
अनन्त चतुर्दशी का पर्व भारतीय कालगणना और धर्मशास्त्रीय परम्परा में उस परब्रह्म की उपासना का प्रतिमान है, जो देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से सर्वथा मुक्त है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, अपितु यह जीवात्मा के परमात्मा में विलीनीकरण और ब्रह्मांडीय शक्तियों के साथ तादात्म्य स्थापित करने की एक सूक्ष्म प्रक्रिया है । 'अनन्त' शब्द की व्युत्पत्ति ही उस सत्ता की ओर संकेत करती है जिसका न आदि है, न मध्य और न ही अंत। वैदिक वाङ्मय से लेकर पुराणों तक, भगवान विष्णु के 'अनन्त' स्वरूप को ही सृष्टि का आधार माना गया है, जो शेषनाग की शय्या पर क्षीर सागर में शयन करते हुए सम्पूर्ण ब्रह्मांड का नियमन करते हैं ।
शास्त्रीय दृष्टि से यह व्रत काम्य और नित्य दोनों श्रेणियों में परिगणित होता है। भविष्यपुराण के उत्तर पर्व में भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सम्बोधित करते हुए इस व्रत की महिमा का गान किया है, जहाँ इसे 'अनन्त फल' देने वाला और 'अनन्त सुख' प्रदाता बताया गया है । इस शोध प्रतिवेदन का उद्देश्य अनन्त चतुर्दशी के तिथि निर्णय, पूजन विधान, अनन्त सूत्र के रहस्यों, पुराणीय कथाओं और इसके सामाजिक-सांस्कृतिक महत्त्व का एक ऐसा विवेचन प्रस्तुत करना है जो प्रामाणिक ग्रंथों और शास्त्रीय मतों पर आधारित हो ।
तिथि निर्णय और काल-विवेचना: निर्णयसिन्धु एवं धर्मसिन्धु के आलोक में
अनन्त चतुर्दशी के व्रत की तिथि का निर्धारण धर्मशास्त्र के अत्यंत सूक्ष्म नियमों के अधीन है। मुख्य रूप से निर्णयसिन्धु, धर्मसिन्धु, और तिथितत्त्व जैसे ग्रंथों में इस विषय पर गहन विमर्श प्राप्त होता है। इस व्रत के लिए तिथि की ग्राह्यता का सर्वसम्मत आधार 'मध्याह्न व्यापिनी' होना है ।
मध्याह्न व्याप्ति का सिद्धान्त
धर्मशास्त्रों के अनुसार, अनन्त व्रत का पूजन मध्याह्न काल (दिन के मध्य भाग) में सम्पन्न होना चाहिए। अतः यदि चतुर्दशी तिथि मध्याह्न काल को स्पर्श करती है, तो वही तिथि व्रत के लिए उपयुक्त मानी जाती है । यदि चतुर्दशी तिथि दो दिनों के मध्याह्न को स्पर्श कर रही हो, अथवा किसी भी दिन मध्याह्न में पूर्ण रूप से व्याप्त न हो, तो ऐसी स्थिति में 'पूर्वविद्धा' (पहले दिन वाली) तिथि को ही ग्रहण करने का निर्देश दिया गया है, बशर्ते वह पूर्वाह्न में कुछ अंशों में उपलब्ध हो ।
| तिथि स्थिति | शास्त्रीय निर्देश | ग्रंथ सन्दर्भ |
|---|---|---|
| केवल प्रथम दिन मध्याह्न व्यापिनी | प्रथम दिन ग्राह्य | निर्णयसिन्धु |
| केवल द्वितीय दिन मध्याह्न व्यापिनी | द्वितीय दिन ग्राह्य | धर्मसिन्धु |
| दोनों दिन मध्याह्न व्यापिनी | पूर्वविद्धा (प्रथम दिन) ग्राह्य | तिथितत्त्व |
| किसी भी दिन मध्याह्न व्यापिनी नहीं | पूर्वविद्धा ग्राह्य | कालनिर्णय |
उदय व्यापिनी बनाम मध्याह्न व्यापिनी
यद्यपि सामान्य व्रतों में उदय व्यापिनी तिथि को प्रधानता दी जाती है, किन्तु अनन्त व्रत की प्रकृति ऐसी है कि इसमें मध्याह्न काल का विशेष महत्व है क्योंकि इसी काल में अनन्त सूत्र का निर्माण और पूजन विहित है । निर्णयसिन्धु के अनुसार, यदि चतुर्दशी तिथि १८ घड़ी से कम हो और उस पर पूर्णिमा का वेध हो, तो ऐसी स्थिति में तिथि के क्षय और वृद्धि के वचनों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण किया जाना चाहिए ।
अनन्त-देव और अनन्त-नारायण: देवता और विग्रह स्वरूप
इस व्रत के मुख्य देवता भगवान 'अनन्त' हैं, जिन्हें भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का ही स्वरूप माना गया है । पूजा में भगवान के दो स्वरूपों की प्रधानता रहती है: प्रथम, शेषनाग जो काल के प्रतीक हैं, और द्वितीय, श्री हरि विष्णु जो पुरुषोत्तम स्वरूप हैं ।
शेषनाग और काल-शक्ति
अनन्त चतुर्दशी के दिन शेषनाग की पूजा का विशेष विधान है। शास्त्रों के अनुसार शेषनाग पृथ्वी के आधार हैं और भगवान विष्णु की शय्या के रूप में वे ब्रह्मांड की रक्षा करते हैं । पूजा के समय दूर्वा (घास) के सात कणों या सात फणों वाली दूर्वा से शेषजी की प्रतिमा का निर्माण किया जाता है, जिसे जल से भरे कलश पर स्थापित किया जाता है । यह कलश माता यमुना का प्रतीक माना जाता है, जो काल की गति और पवित्रता को प्रदर्शित करता है ।
अनन्त नारायण का ध्यान
भगवान विष्णु के अनन्त स्वरूप का ध्यान करते समय उन्हें चतुर्भुज, पीताम्बरधारी और शंख-चक्र-गदा-पद्म से सुसज्जित माना जाता है । 'शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं...' इस श्लोक के माध्यम से उनके उस स्वरूप की स्तुति की जाती है जो योगनिद्रा में स्थित होकर भी सम्पूर्ण जगत का आधार बना हुआ है ।
अनन्त सूत्र (दोरक) विधान: चौदह गांठों का ब्रह्मांडीय रहस्य
अनन्त चतुर्दशी व्रत का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विशिष्ट अंग 'अनन्त सूत्र' या 'अनन्त डोर' है। यह सूत्र केवल एक धागा नहीं, अपितु भगवान विष्णु के संरक्षण और उनकी शक्ति का एक सूक्ष्म भौतिक रूप है ।
सूत्र निर्माण और संरचना
- १. सामग्री: यह सूत्र कच्चे सूत (कपास) या रेशम के धागे से बनाया जाता है ।
- २. रंग: सूत्र को कुमकुम, हल्दी या केसर से रंगा जाता है, जो मांगलिकता और पवित्रता का प्रतीक है ।
- ३. गांठों की संख्या: इसमें अनिवार्य रूप से चौदह (१४) गांठें लगाई जाती हैं ।
- ४. माप: कुछ परम्पराओं में (विशेषकर दाक्षिणात्य पद्धतियों में) इसे साधक के अपने शरीर के परिमाण (व्याम) के अनुसार चौदह गुना लम्बा रखने का विधान है ।
चौदह गांठों और चौदह लोकों का सम्बन्ध
शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मांड में चौदह लोक स्थित हैं। अनन्त सूत्र की चौदह गांठें इन चौदह लोकों का प्रतिनिधित्व करती हैं । भगवान विष्णु ने इन लोकों की रचना की और स्वयं चौदह रूपों में प्रकट होकर इनका संरक्षण करने का संकल्प लिया ।
| गांठ संख्या | सम्बन्धित लोक (Loka) | भगवान विष्णु का स्वरूप (Name) |
|---|---|---|
| १ | अतल (Atala) | अनन्त (Ananta) |
| २ | वितल (Vitala) | ऋषिकेश (Rishikesha) |
| ३ | सुतल (Sutala) | पद्मनाभ (Padmanabha) |
| ४ | तलातल (Talatala) | माधव (Madhava) |
| ५ | महातल (Mahatala) | वैकुण्ठ (Vaikuntha) |
| ६ | रसातल (Rasatala) | श्रीधर (Shridhara) |
| ७ | पाताल (Patala) | त्रिविक्रम (Trivikrama) |
| ८ | भू (Bhu) | मधुसूदन (Madhusudana) |
| ९ | भुवः (Bhuvah) | वामन (Vamana) |
| १० | स्वः (Svah) | केशव (Keshava) |
| ११ | जन (Janah) | नारायण (Narayana) |
| १२ | तप (Tapah) | दामोदर (Damodara) |
| १३ | मह (Mahah) | गोविन्द (Govinda) |
| १४ | सत्य (Satya) | श्रीहरि (Srihari) |
इन गांठों के माध्यम से भक्त यह स्वीकार करता है कि उसकी रक्षा भगवान विष्णु के इन चौदह रूपों द्वारा चौदह लोकों में की जा रही है । यह सूत्र बुरी शक्तियों से रक्षा करता है और जीवन में स्थिरता प्रदान करता है ।
षोडशोपचार पूजन विधि: एक शास्त्रीय अनुष्ठान
अनन्त चतुर्दशी की पूजा विधि अत्यंत विस्तृत और भक्तिपूर्ण है। इसमें वैदिक मंत्रों और पौराणिक स्तोत्रों का समन्वय किया जाता है ।
प्रारम्भिक अनुष्ठान
व्रती को प्रातःकाल स्नान करके 'शुचि' होना चाहिए और पीले वस्त्र धारण करने चाहिए । इसके पश्चात पूजा स्थल पर एक सुंदर मंडप बनाकर कुशा या अक्षत के माध्यम से शेषनाग की स्थापना करनी चाहिए । कलश की स्थापना के उपरान्त भगवान अनन्त नारायण का आवाहन किया जाता है ।
मुख्य पूजन सोपान
- १. आवाहन और आसन: भगवान को श्रद्धापूर्वक बुलाना और उन्हें हृदय रूपी आसन पर विराजमान करना ।
- २. अभिषेक: शालिग्राम शिला या प्रतिमा का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शर्करा) से अभिषेक करना ।
- ३. वस्त्र और उपवीत: भगवान को नवीन वस्त्र और यज्ञोपवीत समर्पित करना ।
- ४. गंध-अक्षत-पुष्प: चंदन, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करना ।
- ५. धूप-दीप-नैवेद्य: भगवान के सम्मुख सुगन्धित धूप जलाना, शुद्ध घी का दीपक प्रज्ज्वलित करना और नैवेद्य समर्पित करना । इस दिन विशेष रूप से क्षीर (खीर) और मालपुए का भोग लगाया जाता है ।
- ६. अनन्त सूत्र समर्पण: पूजा के समय अनन्त सूत्र को भगवान के चरणों में रखा जाता है और उसे गंध-पुष्पादि से पूजित किया जाता है ।
अनिवार्य मंत्र और प्रार्थना
अनन्त सूत्र को समर्पित और धारण करते समय निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण अनिवार्य है:
"अनन्तसंसारमहासमुद्रे मग्नान् समभ्युद्धर वासुदेव।
अनन्तरूपे विनियोजितात्मामाह्यनन्तरूपाय नमोनमस्ते।।"
इसका भाव यह है कि हे वासुदेव, मैं इस अनन्त संसार रूपी महासागर में डूबा हुआ हूँ, आप अपने अनन्त स्वरूप के माध्यम से मेरा उद्धार करें । पूजा के अंत में क्षमा प्रार्थना हेतु 'अपराध-सहस्राणि...' या विशेष 'अनन्त प्रार्थना' मंत्र बोला जाता है:
"अनन्त सर्व नागानामधिपः सर्वकामदः।
लवा भूयात् प्रसन्नोमे भक्तानामभयं करः।।"
अनन्त व्रत की पौराणिक कथाएँ: अहंकार, त्याग और उद्धार
किसी भी व्रत की पूर्णता उसकी कथा श्रवण से होती है। अनन्त व्रत की दो प्रमुख कथाएँ लोक में प्रचलित हैं जो इसके आध्यात्मिक और व्यावहारिक पक्ष को स्पष्ट करती हैं ।
सुशीला और कौण्डिन्य ऋषि का आख्यान
यह इस व्रत की मूल कथा है। प्राचीन काल में सुमन्त नामक एक धर्मात्मा ब्राह्मण थे जिनकी पत्नी दीक्षा से सुशीला नामक कन्या का जन्म हुआ । सुशीला अत्यंत धार्मिक और गुणवती थी। दीक्षा की मृत्यु के बाद सुमन्त ने कर्कशा नामक स्त्री से दूसरा विवाह किया, जो स्वभाव से अत्यंत क्रूर थी । सुशीला का विवाह कौण्डिन्य ऋषि से हुआ। विदाई के समय कर्कशा ने अपमानजनक रूप से केवल ईंट और पत्थरों के टुकड़े दिए ।
मार्ग में यमुना तट पर सुशीला ने कुछ स्त्रियों को लाल वस्त्र पहनकर अनन्त व्रत करते देखा । सुशीला ने वहीं इस व्रत का अनुष्ठान किया और चौदह गांठों वाला अनन्त सूत्र अपने बाएं हाथ में बांध लिया । इसके प्रभाव से कौण्डिन्य ऋषि का आश्रम वैभव से भर गया । किन्तु एक दिन कौण्डिन्य ऋषि ने उस सूत्र को देखकर उसे अंधविश्वास माना और उसे तोड़कर अग्नि में जला दिया । यह भगवान अनन्त का अपमान था, जिसके फलस्वरूप ऋषि की समस्त संपत्ति नष्ट हो गई और वे दरिद्र हो गए ।
ऋषि को जब अपनी भूल का बोध हुआ, तो वे 'अनन्त' की खोज में वन चले गए। मार्ग में उन्हें कई ऐसी विभूतियाँ मिलीं (जैसे आम का वृक्ष, गाय, बैल) जिन्होंने अनन्त का पता नहीं दिया क्योंकि वे स्वयं शापग्रस्त थे । अंत में, भगवान अनन्त ने उन्हें दर्शन दिए और बताया कि उनके अपमान के कारण ही यह विपत्ति आई थी 。 भगवान के आदेशानुसार ऋषि ने १४ वर्षों तक इस व्रत का पालन किया और पुनः सुखी हो गए ।
पाण्डवों और श्रीकृष्ण का संवाद
महाभारत के युद्ध से पूर्व जब पाण्डव वनवास की कठिनाइयाँ झेल रहे थे, तब उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से अपनी दुर्दशा का उपाय पूछा । श्रीकृष्ण ने उन्हें अनन्त चतुर्दशी का व्रत करने का सुझाव दिया । श्रीकृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर को बताया कि 'अनन्त' कोई और नहीं, अपितु वे स्वयं ही हैं । युधिष्ठिर ने अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ विधिपूर्वक १४ वर्षों तक इस व्रत का पालन किया, जिसके प्रभाव से उन्हें महाभारत के युद्ध में विजय और अपना खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त हुआ ।
व्रत के नियम, निषेध और आचरण सम्बन्धी निर्देश
अनन्त व्रत केवल एक दिन की पूजा नहीं है, अपितु यह एक दीर्घकालिक साधना है। इसके लिए कुछ कड़े शास्त्रीय नियमों का पालन करना अनिवार्य है 。
आहार सम्बन्धी नियम (Nisheth)
- नमक का त्याग: इस व्रत में नमक का सेवन पूर्णतः वर्जित है । भोजन पूर्णतः सात्विक और मीठा होना चाहिए।
- फलाहार और हविष्य: व्रती को फल, दूध और हविष्य अन्न (जैसे गेहूं और गाय का घी) ही ग्रहण करना चाहिए ।
- मालपुआ और सत्तू: अग्नि पुराण के अनुसार, इस दिन एक 'प्रस्थ' (लगभग १ किलो) आटे से पूड़ी या मालपुआ बनाकर आधा भाग ब्राह्मण को दान करना चाहिए और आधा स्वयं प्रसाद स्वरूप ग्रहण करना चाहिए 。
- वर्जित पदार्थ: लहसुन, प्याज, मांसाहार, मदिरा और तामसिक भोजन का पूर्ण निषेध है 。
अनन्त सूत्र धारण करने के नियम
- १. धारण करने का स्थान: पुरुषों को यह सूत्र अपने दाहिने हाथ की बांह (Arm) पर बांधना चाहिए, और महिलाओं को बाएं हाथ की बांह पर ।
- २. धारण की अवधि: इसे कम से कम १४ दिनों तक बांधे रखना चाहिए । कई लोग इसे अगले वर्ष तक धारण करते हैं और नई पूजा के समय पुराने सूत्र का विसर्जन करते हैं 。
- ३. अपवाद: यदि सूत्र टूट जाए या अशुद्ध हो जाए, तो प्रायश्चित स्वरूप भगवान विष्णु के नाम का जप करना चाहिए और संभव हो तो नवीन सूत्र अभिमंत्रित कर धारण करना चाहिए ।
उद्यापन विधि: १४ वर्ष की साधना की पूर्णता
शास्त्रों के अनुसार, अनन्त व्रत को १४ वर्षों तक करने का विधान है । १४ वर्ष पूर्ण होने पर व्रत का 'उद्यापन' करना अनिवार्य है ताकि किए गए व्रत का सम्पूर्ण फल स्थिर हो सके ।
उद्यापन प्रक्रिया (Udyapan Vidhi)
- १. सर्वतोभद्र मण्डल: पूजा स्थल पर एक सुंदर मण्डल बनाया जाता है और उस पर १४ कलशों की स्थापना की जाती है ।
- २. हवन: पुरुषसूक्त के मंत्रों से तिल, घी और समिधा की आहुतियां दी जाती हैं ।
- ३. ब्राह्मण भोजन: १४ ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और उन्हें श्रद्धापूर्वक दान-दक्षिणा दी जाती है । प्रत्येक ब्राह्मण को एक अनन्त सूत्र और वस्त्र देना अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है ।
- ४. अनन्त का दान: कलश के साथ स्थापित किए गए अनन्त सूत्र को किसी सत्पात्र ब्राह्मण को दान कर दिया जाता है 。
| उद्यापन घटक | विवरण | शास्त्रीय महत्व |
|---|---|---|
| कलश संख्या | १४ | १४ लोकों की उपस्थिति |
| दान पात्र | १४ ब्राह्मण | साक्षात विष्णु स्वरूप |
| मुख्य भोग | खीर, मालपुआ | सात्विक तुष्टि |
| जप संख्या | १०८ बार (प्रत्येक गांठ हेतु) | मंत्र सिद्धि |
अनन्त चतुर्दशी और गणेश विसर्जन: एक ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक समन्वय
अनन्त चतुर्दशी का उत्सव भारत के कई हिस्सों में, विशेषकर महाराष्ट्र में, गणेश विसर्जन के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है । यद्यपि ये दो पृथक परम्पराएं हैं, किन्तु इनके कालगत संयोग ने इसे एक महान उत्सव का रूप दे दिया है。
गणेशोत्सव का समापन और दार्शनिक पक्ष
गणेश चतुर्थी पर जो भगवान गणेश भक्तों के घर पधारते हैं, वे १० दिनों की सेवा स्वीकार कर अनन्त चतुर्दशी को विसर्जित होते हैं । 'विसर्जन' का अर्थ अंत नहीं, अपितु 'विशेष सृजन' या ब्रह्म में लीन होना है। जिस प्रकार अनन्त नारायण समस्त ब्रह्मांड के आधार हैं, उसी प्रकार विघ्नहर्ता गणेश का विसर्जन यह संदेश देता है कि रूप (Form) अंततः अरूप (Formless) में विलीन हो जाता है 。
लोकमान्य तिलक का योगदान
आधुनिक काल में अनन्त चतुर्दशी की विसर्जन यात्राओं को सार्वजनिक और राष्ट्रीय स्वरूप लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने प्रदान किया । १८९३ में उन्होंने इस धार्मिक अवसर को सामाजिक संगठन और स्वाधीनता आंदोलन का माध्यम बनाया । तिलक का मानना था कि सामूहिक विसर्जन यात्राएं समाज के विभिन्न वर्गों को एक सूत्र में बांधती हैं, जो 'अनन्त' की एकता का ही एक सामाजिक रूप है 。
जैन परम्परा में अनन्त चतुर्दशी: अनन्तनाथ और तप की महिमा
जैन धर्म में अनन्त चतुर्दशी 'दशलक्षण पर्व' के अंत में आती है और यह अत्यंत पवित्र मानी जाती है । यह पर्व चौदहवें तीर्थंकर भगवान 'अनन्तनाथ' को समर्पित है 。
जैन व्रत विधि
जैन मतावलंबी इस दिन उपवास रखते हैं और भगवान अनन्तनाथ की विशेष अष्टद्रव्य पूजा करते हैं । वे 'अनन्त यंत्र' का निर्माण करते हैं और चौदह तीर्थंकरों की स्थापना कर उनकी आराधना करते हैं । जैन धर्म में भी १४ के अंक का अत्यधिक महत्व है, जो जीव के १४ गुणस्थानों (Spiritual Stages) को दर्शाता है । इस प्रकार, अनन्त चतुर्दशी हिन्दू और जैन दोनों परम्पराओं में आत्म-शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है。
दान, फल-श्रुति एवं शोधपरक निष्कर्ष
अनन्त चतुर्दशी के व्रत का फल 'अक्षय' और 'अनन्त' बताया गया है ।
दान का महत्व
इस दिन दान का फल कोटि गुना बढ़ जाता है। विशेष रूप से अन्न दान, वस्त्र दान और घृत दान की महिमा गाई गई है । शनिवार और अनन्त चतुर्दशी का संयोग होने पर शनि दोष की शांति हेतु काले तिल और तेल के दान का भी विधान है ।
फल-श्रुति (Benefits)
- पाप मुक्ति: संचित पापों का विनाश और आत्मिक शांति ।
- संकट निवारण: जीवन की बाधाओं और अकाल मृत्यु से सुरक्षा ।
- ऐश्वर्य प्राप्ति: दरिद्रता का नाश और सुख-समृद्धि का आगमन ।
- मोक्ष प्राप्ति: अंत समय में विष्णु पद (वैकुण्ठ) की प्राप्ति ।
निष्कर्ष
अनन्त चतुर्दशी का पर्व भारतीय मनीषा की उस सूक्ष्म दृष्टि का परिचायक है जो भौतिकता के पीछे छिपे अनन्त सत्य को पहचानती है। चौदह गांठों वाला सूत्र केवल एक रक्षा कवच नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय लोकों और ईश्वरीय शक्तियों के साथ मनुष्य का एक अनुबन्ध (Contract) है। यह व्रत मनुष्य को अहंकार त्यागने (कौण्डिन्य की भांति) और श्रद्धापूर्वक धर्म पथ पर चलने (सुशीला और पाण्डवों की भांति) की प्रेरणा देता है। चाहे वह गणेश विसर्जन का उल्लास हो या अनन्त नारायण की मौन उपासना, यह दिन हमें स्मरण कराता है कि जीवन की सार्थकता उस 'अनन्त' सत्ता में ही निहित है जिससे हम उत्पन्न हुए हैं और जिसमें अंततः हमें समाहित होना है । यह शोध प्रतिवेदन अनन्त चतुर्दशी के समस्त शास्त्रीय, पुराणीय और सामाजिक पक्षों को एक सूत्र में पिरोकर पाठक को इस महापर्व की पूर्णता का बोध कराता है。