विस्तृत उत्तर
महाभारत युद्ध से पूर्व जब पांडव वनवास की कठिनाइयां झेल रहे थे, तब उन्होंने श्रीकृष्ण से उपाय पूछा। श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत चतुर्दशी व्रत करने को कहा और बताया कि 'अनन्त' वे स्वयं ही हैं। युधिष्ठिर ने भाइयों और द्रौपदी के साथ 14 वर्षों तक यह व्रत किया, जिससे उन्हें युद्ध में विजय और खोया राज्य वापस मिला।
महाभारत में पांडवों ने अनंत चतुर्दशी का व्रत क्यों किया था को संदर्भ सहित समझें
महाभारत में पांडवों ने अनंत चतुर्दशी का व्रत क्यों किया था का सबसे सीधा सार यह है: वनवास की कठिनाइयां दूर करने और अपना खोया हुआ राज्य वापस पाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर पांडवों ने 14 साल तक यह व्रत किया था।
पौराणिक कथा जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.
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इसी विषय के 5 प्रश्न
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भगवान कृष्ण के बेटे साम्ब को इस व्रत से क्या फायदा हुआ था?
भगवान कृष्ण के बेटे साम्ब को एक ऋषि के श्राप के कारण 'कुष्ठ रोग' (कोढ़) हो गया था। रथ सप्तमी के दिन सूर्य की विशेष पूजा करने से उसका यह रोग पूरी तरह ठीक हो गया था।
कलाप उपवन में पितर क्या बात कर रहे थे?
कलाप उपवन में पितृगण आपस में वार्तालाप कर रहे थे और अपेक्षा कर रहे थे कि उनके वंश में कोई सन्मार्गशील और धर्मपरायण व्यक्ति उत्पन्न हो जो गया तीर्थ में पिण्डदान करे, पितृ पक्ष की त्रयोदशी या प्रतिपदा को मधु-घृत युक्त पायस का दान करे, वृषोत्सर्ग नीला वृषभ छोड़े, और ब्राह्मणों को दक्षिणा सहित संतुष्ट करे। महाराज पुरुरवा ने ये सब अपेक्षाएँ पूरी कीं।
महाराज पुरुरवा कौन थे?
महाराज पुरुरवा एक चन्द्रवंशी सम्राट थे, जो अत्यंत धर्मपरायण और विष्णु भक्त थे। विष्णु पुराण के तृतीय अंश में उनका प्रसंग वर्णित है। उन्होंने अपने पितरों की आकांक्षा को पूर्ण कर विधिपूर्वक श्राद्ध संपन्न कर उन्हें परम तृप्ति प्रदान की, और परिणामस्वरूप पितरों के आशीर्वाद से अकूत ऐश्वर्य, धर्म और अंततः मोक्ष प्राप्त किया।
पितृ देवताओं ने महर्षि निमि से क्या कहा?
पितृ देवताओं ने महर्षि निमि से कहा कि उनका मृत पुत्र की आत्मा को लक्ष्य करके किया गया ब्राह्मण भोजन साक्षात् पितृ यज्ञ के रूप में उन्हें प्राप्त हुआ है, और उनके इस कृत्य से उनका पुत्र अब पितृ देवों के मध्य उच्च और शांत स्थान प्राप्त कर चुका है। इस आश्वासन से निमि का शोक दूर हुआ।
महर्षि निमि ने पुत्र की मृत्यु पर क्या किया?
महर्षि निमि ने अशांत मन से श्रेष्ठ ब्राह्मणों को अपने आश्रम में आमंत्रित कर वे सभी सात्त्विक और स्वादिष्ट व्यंजन परोसे जो उनके मृत पुत्र को अत्यंत प्रिय थे। पितृ देवताओं ने प्रकट होकर बताया कि यह भोजन साक्षात् पितृ यज्ञ के रूप में उन्हें प्राप्त हुआ है। इसी कार्य से श्राद्ध की लौकिक परम्परा का आरंभ हुआ।
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