विस्तृत उत्तर
महर्षि निमि ने पुत्र की मृत्यु पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों को आश्रम में आमंत्रित कर सात्त्विक भोजन कराया। शास्त्रीय आधार के अनुसार अशांत मन से निमि ने एक दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को अपने आश्रम में आमंत्रित किया, और उन्हें वे सभी सात्त्विक और स्वादिष्ट व्यंजन परोसे जो उनके मृत पुत्र को अत्यंत प्रिय थे।
महर्षि निमि के कार्य के मुख्य अंग इस प्रकार हैं। पहला अंग है ब्राह्मणों का आमंत्रण। महर्षि निमि ने श्रेष्ठ ब्राह्मणों को अपने आश्रम में आमंत्रित किया। श्रेष्ठ अर्थात् उत्तम और सद्गुणी ब्राह्मण। दूसरा अंग है सात्त्विक व्यंजन परोसना। उन्होंने सात्त्विक व्यंजन परोसे, अर्थात् शुद्ध और पवित्र भोजन। तीसरा अंग है स्वादिष्ट व्यंजन देना। ये व्यंजन स्वादिष्ट भी थे, अर्थात् अच्छे और रुचिकर। चौथा अंग है पुत्र को प्रिय व्यंजन। ये वे विशेष व्यंजन थे जो उनके मृत पुत्र को अत्यंत प्रिय थे।
इस कार्य के पीछे की भावना अत्यंत विशेष है। महर्षि निमि ने अशांत मन से यह कार्य किया। अशांत मन अर्थात् दुख और शोक से व्याकुल मन। पुत्र के वियोग में उनका हृदय विदीर्ण हो गया था, और वे गहन शोक में डूबे थे। फिर भी, उन्होंने अपने पुत्र की स्मृति में यह कार्य किया।
पुत्र को प्रिय व्यंजन का चयन भी विशेष है। महर्षि निमि ने वे सभी सात्त्विक और स्वादिष्ट व्यंजन परोसे जो उनके मृत पुत्र को अत्यंत प्रिय थे। अर्थात् उन्होंने अपने पुत्र की पसंद के अनुसार भोजन तैयार करवाया। यह श्रद्धा का अनोखा रूप है, क्योंकि उन्होंने अपने पुत्र को याद करते हुए, उसकी पसंद के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराया।
इस कार्य के बाद की कथा अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब ब्राह्मण तृप्त होकर चले गए, तो महर्षि नारद वहां पधारे। निमि ने उनसे अपनी मानसिक व्यथा साझा की। कुछ ही समय पश्चात् वहां पितृ देवता स्वयं प्रकट हुए। उन्होंने निमि को सांत्वना देते हुए कहा, हे महर्षि निमि, तुमने अपने मृत पुत्र की आत्मा को लक्ष्य करके जो भोजन ब्राह्मणों को कराया है, वह साक्षात् पितृ यज्ञ के रूप में हमें प्राप्त हुआ है। तुम्हारे इस कृत्य से तुम्हारा पुत्र अब पितृ देवों के मध्य उच्च और शांत स्थान प्राप्त कर चुका है।
इस घटना का व्यापक प्रभाव यह हुआ कि श्राद्ध की लौकिक परम्परा प्रारंभ हुई। इस दृष्टांत से महर्षि निमि का शोक दूर हुआ, और उन्हें ज्ञात हुआ कि मृत्यु के पश्चात् भी तर्पण द्वारा प्रियजनों की आत्मा को तृप्त किया जा सकता है। इसके पश्चात् ही अन्य महर्षियों और राजाओं ने श्राद्ध कर्म को अपना लौकिक कर्तव्य मान लिया।
महर्षि निमि के कार्य का दार्शनिक संदेश गहरा है। यह सिद्ध करता है कि श्रद्धा से किया गया कार्य पवित्र हो जाता है। ब्राह्मणों को सात्त्विक भोजन कराना एक साधारण कार्य था, परंतु उसमें मृत पुत्र की आत्मा के प्रति श्रद्धा जुड़ने से वह साक्षात् पितृ यज्ञ बन गया। यह सच्ची श्रद्धा का प्रत्यक्ष प्रदर्शन है।
ब्राह्मणों के माध्यम से पितरों तक भोजन पहुँचने का सिद्धांत भी इसी कथा से आरंभ हुआ। महर्षि निमि ने ब्राह्मणों को भोजन कराया, और वह भोजन साक्षात् पितृ यज्ञ के रूप में पितृ देवताओं को प्राप्त हुआ। यह सिद्ध करता है कि ब्राह्मण पितरों के माध्यम हैं, और उन्हें भोजन कराना पितरों को भोजन कराने के समान है।
इस सिद्धांत को आज भी श्राद्ध में अपनाया जाता है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार श्राद्ध में देव कार्य के लिए दो और पितृ कार्य के लिए तीन या अयुग्म अर्थात् विषम संख्या जैसे एक, तीन, पांच ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है। भोजन कराते समय ब्राह्मणों के शरीर में अपने पूर्वजों की उपस्थिति की भावना करनी चाहिए। यह भावना महर्षि निमि के कार्य से ही प्रेरित है।
महर्षि निमि का यह कार्य सात्त्विक भोजन के महत्व को भी दर्शाता है। उन्होंने सात्त्विक व्यंजन परोसे, मांस आदि नहीं। यह श्रीमद्भागवत के सिद्धांत के अनुरूप है, जिसमें कहा गया है कि भागवत पुराण श्राद्ध में पशु-हिंसा और मांसाहार का पूर्णतः निषेध करता है। पितरों को मुनियों के योग्य पवित्र हविष्यान्न अर्थात् सात्त्विक अन्न से ही तृप्ति मिलती है।
महर्षि निमि की यह विधि श्राद्ध की मूल भावना है। श्राद्ध शब्द का अर्थ ही है श्रद्धया दीयते यस्मात् तत् श्राद्धम्, अर्थात् पितरों के निमित्त जो भी अन्न, जल, पिण्ड अथवा तर्पण पूर्ण श्रद्धा और आस्तिकता के साथ अर्पित किया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है। महर्षि निमि ने अपने पुत्र की स्मृति में पूर्ण श्रद्धा से ब्राह्मण भोजन कराया, जो श्राद्ध का प्रथम लौकिक रूप था। शास्त्रीय आधार के रूप में वराह पुराण इस कथा का प्रमुख प्रामाणिक स्रोत है। निष्कर्षतः महर्षि निमि ने पुत्र की मृत्यु पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों को अपने आश्रम में आमंत्रित कर वे सभी सात्त्विक और स्वादिष्ट व्यंजन परोसे जो उनके मृत पुत्र को अत्यंत प्रिय थे। इसी कार्य से श्राद्ध की लौकिक परम्परा का आरंभ हुआ।
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