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पौराणिक कथा प्रश्नोत्तर — 50 प्रश्न

पौराणिक कथा से जुड़े 50 प्रामाणिक प्रश्नोत्तर पढ़ें। शास्त्रों और पुराणों पर आधारित उत्तर एक ही जगह मिलेंगे।

कुल 50 प्रश्न

कलाप उपवन में पितर क्या बात कर रहे थे?

कलाप उपवन में पितृगण आपस में वार्तालाप कर रहे थे और अपेक्षा कर रहे थे कि उनके वंश में कोई सन्मार्गशील और धर्मपरायण व्यक्ति उत्पन्न हो जो गया तीर्थ में पिण्डदान करे, पितृ पक्ष की त्रयोदशी या प्रतिपदा को मधु-घृत युक्त पायस का दान करे, वृषोत्सर्ग नीला वृषभ छोड़े, और ब्राह्मणों को दक्षिणा सहित संतुष्ट करे। महाराज पुरुरवा ने ये सब अपेक्षाएँ पूरी कीं।

कलाप उपवनपितृगण वार्तालापश्राद्ध अपेक्षा
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महाराज पुरुरवा कौन थे?

महाराज पुरुरवा एक चन्द्रवंशी सम्राट थे, जो अत्यंत धर्मपरायण और विष्णु भक्त थे। विष्णु पुराण के तृतीय अंश में उनका प्रसंग वर्णित है। उन्होंने अपने पितरों की आकांक्षा को पूर्ण कर विधिपूर्वक श्राद्ध संपन्न कर उन्हें परम तृप्ति प्रदान की, और परिणामस्वरूप पितरों के आशीर्वाद से अकूत ऐश्वर्य, धर्म और अंततः मोक्ष प्राप्त किया।

महाराज पुरुरवाचन्द्रवंशी सम्राटविष्णु भक्त
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पितृ देवताओं ने महर्षि निमि से क्या कहा?

पितृ देवताओं ने महर्षि निमि से कहा कि उनका मृत पुत्र की आत्मा को लक्ष्य करके किया गया ब्राह्मण भोजन साक्षात् पितृ यज्ञ के रूप में उन्हें प्राप्त हुआ है, और उनके इस कृत्य से उनका पुत्र अब पितृ देवों के मध्य उच्च और शांत स्थान प्राप्त कर चुका है। इस आश्वासन से निमि का शोक दूर हुआ।

पितृ देवता संदेशपितृ यज्ञउच्च स्थान
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महर्षि निमि ने पुत्र की मृत्यु पर क्या किया?

महर्षि निमि ने अशांत मन से श्रेष्ठ ब्राह्मणों को अपने आश्रम में आमंत्रित कर वे सभी सात्त्विक और स्वादिष्ट व्यंजन परोसे जो उनके मृत पुत्र को अत्यंत प्रिय थे। पितृ देवताओं ने प्रकट होकर बताया कि यह भोजन साक्षात् पितृ यज्ञ के रूप में उन्हें प्राप्त हुआ है। इसी कार्य से श्राद्ध की लौकिक परम्परा का आरंभ हुआ।

निमि कार्यब्राह्मण भोजनपुत्र प्रिय व्यंजन
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महर्षि निमि का पुत्र क्यों मरा?

महर्षि निमि का अत्यंत आज्ञाकारी और तपस्वी पुत्र कठोर तपस्या के दौरान अकाल मृत्यु को प्राप्त हुआ। दुर्भाग्यवश तपस्या के दौरान उसकी असमय मृत्यु हुई। इस अकाल मृत्यु से महर्षि निमि का हृदय विदीर्ण हो गया, और वे गहन शोक में डूब गए। इसी शोक से उन्होंने श्राद्ध की लौकिक परम्परा का आरंभ किया।

निमि पुत्र मृत्युअकाल मृत्युकठोर तपस्या
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महर्षि निमि कौन थे?

महर्षि निमि एक महान ऋषि थे, जो ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महर्षि अत्रि के वंश में हुए थे। उनके पुत्र की अकाल मृत्यु से उत्पन्न शोक के कारण उन्होंने ब्राह्मणों को सात्त्विक भोजन कराया, जिससे श्राद्ध की लौकिक परम्परा का आरंभ हुआ। वराह पुराण में उनकी कथा का वर्णन है।

महर्षि निमिअत्रि वंशनिमि कथा
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कुशा घास कैसे उत्पन्न हुई?

कुशा घास भगवान वराह के दिव्य रोमों से उत्पन्न हुई। जब भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला, उसके बाद उनके दिव्य रोमों से पवित्र कुशा घास का प्रादुर्भाव हुआ। इसीलिए श्राद्ध में कुशा अत्यंत पवित्र मानी जाती है, क्योंकि यह साक्षात् नारायण के शरीर से उत्पन्न हुई है।

कुशा उत्पत्तिवराह दिव्य रोमपवित्र घास
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काले तिल की उत्पत्ति कैसे हुई?

काले तिल की उत्पत्ति भगवान वराह के शरीर से उत्पन्न पसीने की बूंदों से हुई। जब भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला, तब उनके पसीने की बूंदें पृथ्वी पर गिरीं, और उनसे काले तिल उत्पन्न हुए। इसीलिए श्राद्ध में काले तिल अत्यंत पवित्र और अनिवार्य माने जाते हैं।

काले तिल उत्पत्तिवराह पसीनादिव्य उद्भव
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पहला पिण्ड किस मिट्टी से बना?

पहला पिण्ड भगवान वराह की दाढ़ से दक्षिण दिशा की ओर गिरे पृथ्वी के मृदा अंश अर्थात् मिट्टी से बना था। यह वह मृदा थी जिसे भगवान ने हिरण्याक्ष का वध करके रसातल से बाहर निकाला था। इससे तीन गोलाकार पिण्ड बने, जो पिता, पितामह और प्रपितामह के शाश्वत प्रतीक हैं।

पहला पिण्डमृदा अंशवराह दाढ़
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भगवान वराह ने पिण्डदान कब शुरू किया?

भगवान वराह ने पिण्डदान तब शुरू किया जब उन्होंने हिरण्याक्ष नामक महादैत्य का वध कर पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला। उनकी दाढ़ से दक्षिण दिशा की ओर गिरे मृदा अंश से तीन पिण्ड बनाकर, कुशा के ऊपर स्थापित कर, उन्हें पिता, पितामह और प्रपितामह के शाश्वत प्रतीक घोषित किया। यह सम्पूर्ण जगत में पिण्डदान की पवित्र परम्परा का आरंभ था।

वराह अवतारहिरण्याक्ष वधपृथ्वी रसातल
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पिण्डदान की शुरुआत किसने की?

पिण्डदान की शुरुआत स्वयं भगवान विष्णु के वराह अवतार ने की थी। जब उन्होंने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला, तब उनकी दाढ़ से गिरे मृदा अंश से तीन पिण्डों का निर्माण कर, कुशा पर दक्षिण दिशा में स्थापित किया, और उन्हें पिता, पितामह तथा प्रपितामह के शाश्वत प्रतीक घोषित किया।

पिण्डदान शुरुआतभगवान वराहविष्णु अवतार
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माता पार्वती के श्राप से लंगड़ा बालक कैसे ठीक हुआ?

नाग कन्याओं के बताने पर उस बालक ने लगातार 21 'संकष्टी चतुर्थी' का अत्यंत कठोर व्रत किया, जिससे भगवान गणेश ने खुश होकर उसे पूरी तरह से ठीक कर दिया।

विकट संकष्टीश्राप मुक्तिव्रत प्रभाव
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शिव-पार्वती के चौसर (पांसे) की कहानी?

चौसर के खेल में एक बालक ने माता पार्वती के जीतने पर भी पक्षपात करते हुए शिव जी को जीता हुआ बता दिया, जिस पर गुस्सा होकर माता ने उसे लंगड़ा होने का श्राप दे दिया।

चौसरशिव पार्वतीश्राप
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देवराज इंद्र का विमान क्यों गिर गया था?

गणेश पुराण के अनुसार, एक अत्यंत महापापी मनुष्य की बुरी नज़र (दृष्टि-दोष) पड़ने के कारण इंद्र के विमान का सारा पुण्य नष्ट हो गया और वह ज़मीन पर गिर पड़ा।

इंद्र विमानगणेश पुराणदृष्टि दोष
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हनुमान जी ने संकष्टी व्रत क्यों किया था?

माता सीता की खोज के दौरान सौ योजन के विशाल समुद्र को लांघने के लिए वृद्ध संपाती के कहने पर हनुमान जी ने यह संकटमोचक व्रत किया था।

हनुमान जीरामायणसीता खोज
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भगवान कृष्ण के बेटे साम्ब को इस व्रत से क्या फायदा हुआ था?

भगवान कृष्ण के बेटे साम्ब को एक ऋषि के श्राप के कारण 'कुष्ठ रोग' (कोढ़) हो गया था। रथ सप्तमी के दिन सूर्य की विशेष पूजा करने से उसका यह रोग पूरी तरह ठीक हो गया था।

साम्बकुष्ठ रोगश्रीकृष्ण
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इन्दुमती की कथा क्या है और उसने यह व्रत क्यों किया?

भविष्य पुराण के अनुसार, इन्दुमती एक वेश्या थी जिसने जिंदगी में कभी पूजा-पाठ नहीं किया था। बुढ़ापे में मृत्यु के डर से उसने यह व्रत किया, जिसके पुण्य से उसे मोक्ष और 'सूर्य-लोक' मिला।

इन्दुमतीभविष्य पुराणमोक्ष
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महाभारत में पांडवों ने अनंत चतुर्दशी का व्रत क्यों किया था?

वनवास की कठिनाइयां दूर करने और अपना खोया हुआ राज्य वापस पाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर पांडवों ने 14 साल तक यह व्रत किया था।

पांडवश्रीकृष्णमहाभारत
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कौण्डिन्य ऋषि द्वारा अनंत सूत्र (धागा) जलाने का क्या परिणाम हुआ था?

धागा जलाने से भगवान विष्णु का अपमान हुआ, जिससे ऋषि की सारी संपत्ति नष्ट हो गई और वे एकदम गरीब हो गए। भूल सुधारने के लिए उन्हें 14 साल तक यह व्रत करना पड़ा।

अपमानदरिद्रताप्रायश्चित
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सुशीला और कौण्डिन्य ऋषि की अनंत चतुर्दशी कथा क्या है?

ब्राह्मण की पुत्री सुशीला ने शादी के बाद यमुना तट पर यह व्रत किया था, जिसके चमत्कार से उसके पति कौण्डिन्य ऋषि का आश्रम अपार धन-संपत्ति और वैभव से भर गया था।

सुशीलाकौण्डिन्य ऋषिमूल कथा
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माता मनसा को भगवान शिव की पुत्री और वासुकि नाग की बहन क्यों कहा जाता है?

चूंकि वे भगवान शिव के तेज से सजीव हुई थीं, इसलिए शिव ने उन्हें अपनी 'मानस पुत्री' माना। साथ ही, नागराज वासुकि के परिवार से जुड़े होने के कारण वे उनकी बहन कहलाईं।

शिव की मानस पुत्रीनागराज वासुकिकैलाश
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मनसा देवी कौन हैं और उनका जन्म कैसे हुआ?

देवी मनसा महर्षि कश्यप के 'मन' (संकल्प शक्ति) से उत्पन्न हुई थीं। एक अन्य कथा के अनुसार, नागराज वासुकि की माता द्वारा बनाई मूर्ति में भगवान शिव के तेज से उनका जन्म हुआ था।

मनसा देवी का जन्ममहर्षि कश्यपकल्प भेद
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एकादशी माता की उत्पत्ति कैसे हुई (मुर दैत्य की कथा)?

देवताओं को परेशान करने वाले 'मुर' दैत्य को मारने के लिए भगवान विष्णु के मन (ग्यारहवीं इंद्रिय) से एक शक्ति प्रकट हुई थी, जिसे भगवान ने 'एकादशी' नाम दिया।

एकादशी उत्पत्तिमुर दैत्यभगवान विष्णु
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भगवान विष्णु 4 महीने पाताल लोक में क्यों रहते हैं (राजा बलि की कथा)?

वामन अवतार के समय राजा बलि की दानवीरता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे वरदान दिया था कि वे 4 महीने (चातुर्मास) पाताल लोक में उसके महल के पहरेदार बनकर रहेंगे।

राजा बलिपाताल लोकवामन अवतार
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समुद्र मंथन और मोहिनी अवतार की कथा क्या है?

समुद्र मंथन से निकले अमृत को असुरों ने छीन लिया था। तब भगवान विष्णु ने 'मोहिनी' नाम की अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप धारण कर असुरों को भ्रमित किया और सारा अमृत देवताओं को पिला दिया।

समुद्र मंथनमोहिनी अवतारदेवासुर संग्राम
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एकादशी के दिन अनाज क्यों नहीं खाते?

पुराणों के अनुसार, एकादशी के दिन 'पाप पुरुष' अनाज में छुपकर बैठता है। इसलिए इस दिन अनाज खाने वाला व्यक्ति असल में पाप खाता है।

अन्न निषेधपाप पुरुषमाधव तिथि
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निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी क्यों कहते हैं?

भूख बर्दाश्त न कर पाने के कारण भीमसेन साल भर के व्रत नहीं कर सकते थे। महर्षि व्यास के कहने पर उन्होंने सिर्फ इस एक दिन बिना पानी पिए कठिन व्रत किया था, इसलिए इसे 'भीमसेनी एकादशी' कहते हैं।

भीमसेनी एकादशीपाण्डव एकादशीवृक अग्नि
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एकादशी के दिन अन्न (अनाज) क्यों नहीं खाते?

पद्म पुराण के अनुसार, एकादशी के दिन 'पापपुरुष' (पापों का पुतला) अनाज में छुपकर बैठता है। इसलिए जो भी इंसान एकादशी के दिन अनाज खाता है, वह असल में पापों को खाता है।

अन्न निषेधपापपुरुषपद्म पुराण
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एकादशी माता की उत्पत्ति कैसे हुई और इस दिन अनाज क्यों नहीं खाते (पाप पुरुष की कथा)?

भगवान विष्णु ने नरक में जीवों का कष्ट दूर करने के लिए एकादशी देवी को प्रकट किया था। एकादशी के दिन 'पाप पुरुष' अनाज में छुपकर बैठता है, इसलिए इस दिन अनाज खाना पाप है।

एकादशी उत्पत्तिपाप पुरुषअन्न निषेध
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कालभैरव पर लगा 'ब्रह्महत्या' का पाप कैसे दूर हुआ?

ब्रह्मा जी का सिर काटने के कारण कालभैरव पर ब्रह्महत्या का पाप लगा था। जब वे भिक्षाटन करते हुए काशी (वाराणसी) पहुंचे, तब वहां की पवित्र भूमि पर पैर रखते ही वे इस पाप से मुक्त हुए।

ब्रह्महत्याकपालमोचनकाशी
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भगवान कालभैरव की उत्पत्ति कैसे हुई? (ब्रह्मा के अहंकार की कथा)

शिवपुराण के अनुसार, जब ब्रह्मा जी के पांचवें मुख ने अहंकारवश भगवान शिव की निंदा की, तब शिव जी के क्रोध से कालभैरव की उत्पत्ति हुई थी।

कालभैरव उत्पत्तिशिवपुराणब्रह्मा का अहंकार
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भगवान राम की 'अकाल बोधन' दुर्गा पूजा क्या है?

भगवान राम ने रावण को मारने के लिए असमय (अकाल) दुर्गा पूजा की थी और 108 कमल चढ़ाए थे। एक कमल कम पड़ने पर जब राम ने अपनी आँख निकालनी चाही, तो माता ने प्रकट होकर विजय का आशीर्वाद दिया था।

अकाल बोधनभगवान रामकालिका पुराण
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दुर्गाष्टमी पर रक्तबीज और चंड-मुंड वध की कथा क्या है?

दुर्गा सप्तशती के अनुसार, अष्टमी के दिन ही माता ने अपने रौद्र रूप (चामुंडा/कालरात्रि) में चंड-मुंड और 'रक्तबीज' नामक राक्षसों का वध किया था और रक्तबीज का सारा खून पी लिया था।

दुर्गा सप्तशतीरक्तबीजचंड-मुंड
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माता का नाम 'दुर्गा' कैसे पड़ा? (देवी भागवत पुराण की कथा)

देवी भागवत पुराण के अनुसार, आदिशक्ति माता ने 'दुर्गम' (दुर्गमासुर) नामक एक अत्यंत भयंकर असुर का वध किया था। दुर्गम का वध करने के कारण ही उनका नाम 'दुर्गा' पड़ गया।

दुर्गा नामकरणदुर्गम वधदेवी भागवत
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मासिक दुर्गाष्टमी पर दुर्गमासुर वध की कथा क्या है?

'दुर्गमासुर' नामक दैत्य ने वेदों को चुराकर धरती पर 100 साल का सूखा ला दिया था। तब माता ने प्रकट होकर उसका वध किया और धरती को बचाया। यह वध अष्टमी के दिन ही हुआ था।

दुर्गमासुरदेवी भागवतशाकम्भरी
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रावण शिव भक्त था फिर पापी कैसे कहलाया

रावण शिवभक्त, वेदज्ञ, महाशक्तिशाली — पर पापी कहलाया क्योंकि: अहंकार, सीता हरण (परस्त्री अपहरण), ऋषियों पर अत्याचार, शक्ति का दुरुपयोग। शिक्षा: भक्ति + अहंकार = विनाश। ज्ञान बिना सदाचार = व्यर्थ। भक्ति ≠ अधर्म की अनुमति।

रावणशिव भक्तपाप
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समुद्र मंथन की कथा का आध्यात्मिक अर्थ

क्षीरसागर = मन; मंदराचल = साधना; वासुकि = प्राण; देव-असुर = शुभ-अशुभ गुण; कूर्म = ईश्वर कृपा; हालाहल = साधना में उभरे विकार (शिव/ज्ञान ग्रहण करे); अमृत = आत्मज्ञान/मोक्ष। शिक्षा: विष (कठिनाई) अमृत (ज्ञान) से पहले आता है।

समुद्र मंथनआध्यात्मिक अर्थप्रतीक
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ध्रुव ने किस उम्र में तपस्या की क्या प्राप्त किया

ध्रुव ने 5 वर्ष की आयु में 6 मास तपस्या की (सौतेली माता के अपमान से प्रेरित)। विष्णु प्रसन्न हुए — ध्रुवलोक (ध्रुव तारा), 36,000 वर्ष राज्य और शाश्वत स्थान प्राप्त। शिक्षा: आयु बाधा नहीं, अपमान प्रेरणा बन सकता है।

ध्रुवतपस्याध्रुव तारा
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गणेश जी का सिर क्यों कटा और हाथी सिर कैसे लगा

पार्वती ने उबटन से बालक बनाया, द्वारपाल नियुक्त किया। शिव को रोकने पर शिव ने क्रोध में सिर काटा। पार्वती के क्रोध पर शिव ने हाथी का सिर लगाकर पुनर्जीवित किया। वरदान: सर्वप्रथम पूज्य। आध्यात्मिक: मानव सिर कटना = अहंकार नाश; गज सिर = बुद्धि, विवेक।

गणेशसिर कटनाहाथी
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नचिकेता यमराज कथा से क्या शिक्षा कठोपनिषद

शिक्षाएं: श्रेय (ज्ञान) चुनो, प्रेय (भोग) नहीं। सत्य पर दृढ़ रहो। भोग अस्थायी, ज्ञान शाश्वत। आत्मा अमर — मृत्यु भय व्यर्थ। बुद्धि (विवेक) से इंद्रियां नियंत्रित करो (रथ रूपक)। शुद्ध जिज्ञासा सर्वशक्तिमान — बालक ने मृत्यु से अमरत्व सीखा।

नचिकेताकठोपनिषदयम
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राधा कृष्ण का प्रेम आध्यात्मिक था या सांसारिक

राधा-कृष्ण प्रेम पूर्णतः आध्यात्मिक — राधा = ह्लादिनी शक्ति/जीवात्मा, कृष्ण = परमात्मा। यह सांसारिक प्रेम (possession) नहीं बल्कि निःस्वार्थ विरह भक्ति है। विरह = आत्मा की ईश्वर-मिलन व्याकुलता। चैतन्य परंपरा: अप्राकृत (अलौकिक) प्रेम।

राधा कृष्णप्रेमआध्यात्मिक
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सावित्री ने यमराज से पति को कैसे वापस लाया

सावित्री ने यमराज का पीछा कर बुद्धि और तर्क से वरदान प्राप्त किए। अंतिम वर में तर्क दिया — 'पतिव्रता हूं, संतान पति बिना कैसे?' यम ने सत्यवान को जीवनदान दिया। शिक्षा: प्रेम + बुद्धि + दृढ़ संकल्प = मृत्यु पर विजय। नारी शक्ति का अद्भुत उदाहरण।

सावित्रीसत्यवानयमराज
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शिव ने गंगा जटाओं में क्यों धारण किया कथा

सगर पुत्रों (60,000) की मुक्ति हेतु भगीरथ ने तपस्या से गंगा को स्वर्ग से बुलाया। गंगा का प्रचंड वेग पृथ्वी नष्ट कर देता, अतः शिव ने जटाओं में धारण कर वेग नियंत्रित किया। आध्यात्मिक: गंगा=ज्ञान, शिव=गुरु — बिना गुरु ज्ञान नियंत्रित नहीं।

शिवगंगाभगीरथ
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भक्त प्रह्लाद की कथा से क्या शिक्षा

शिक्षा: सच्ची भक्ति सर्वशक्तिमान (5 वर्ष के बालक ने भगवान प्रकट किए)। अहंकार का विनाश निश्चित। भगवान सर्वव्यापी (खंभे में भी)। संकट में भी धर्म न छोड़ो। प्रह्लाद ने नवधा भक्ति (भागवत 7.5.23) का सिद्धांत दिया।

प्रह्लादनरसिंहभक्ति
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कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत क्यों उठाया आध्यात्मिक अर्थ

इंद्र यज्ञ रोककर गोवर्धन पूजा = अंधी परंपरा तोड़ना, प्रकृति सम्मान। इंद्र की प्रलयंकारी वर्षा में पर्वत उठाना = भगवान की शरण = सर्वरक्षा। आध्यात्मिक: इंद्र=अहंकार, गोवर्धन=प्रकृति/इंद्रिय पालन, कनिष्ठा उंगली=ईश्वर के लिए सब सरल।

गोवर्धनकृष्णइंद्र
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गजेंद्र मोक्ष की कथा का आध्यात्मिक संदेश

गजेंद्र (जीवात्मा) को मगरमच्छ (संसार बंधन) पकड़ता है। अपनी शक्ति, परिवार — सब असफल। अंत में पूर्ण शरणागति ('ॐ नमो भगवते') → विष्णु तुरंत आए, मुक्त किया। शिक्षा: अहंकार त्यागकर पूर्ण समर्पण ही एकमात्र मोक्ष मार्ग।

गजेंद्र मोक्षविष्णुशरणागति
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गणेश जी की कथा क्या है?

गणेश जी का जन्म माता पार्वती ने अपने शरीर के मैल से किया। शिव जी ने अनजाने में उनका सिर काट दिया, फिर हाथी का सिर लगाकर पुनर्जीवित किया और 'प्रथम पूज्य' घोषित किया। माता-पिता की परिक्रमा से प्रथम पूज्य का वरदान मिला। परशुराम से युद्ध में एक दाँत टूटने से 'एकदंत' नाम पड़ा।

गणेश कथाजन्म कथाहाथी का सिर
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पौराणिक कथा — शास्त्रीय प्रश्नोत्तर संग्रह

पौराणिक पर पौराणिक कथा श्रेणी में आपको सनातन धर्म, वेद, पुराण और शास्त्रों पर आधारित प्रामाणिक प्रश्न-उत्तर मिलेंगे। प्रत्येक उत्तर विद्वानों द्वारा शास्त्रीय प्रमाणों सहित तैयार किया गया है। किसी भी प्रश्न पर क्लिक करें और विस्तृत उत्तर पढ़ें। अन्य विषयों के लिए प्रश्नोत्तरी मुख्य पृष्ठ देखें।

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पौराणिक कथा को गहराई से समझने का तरीका

पौराणिक कथा प्रश्नोत्तर पेज छोटे उत्तरों को एक साथ रखता है, इसलिए इसे त्वरित समाधान और आगे पढ़ने के प्रवेश-द्वार दोनों की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

50 प्रश्न वाले इस पेज पर सबसे अच्छा तरीका यह है कि पहले वही प्रविष्टियाँ पढ़ें जो आपके वर्तमान सवाल से सीधा संबंध रखती हैं, फिर उनसे जुड़े अगले लेख या प्रश्न खोलें ताकि आधी-अधूरी जानकारी के बजाय पूरा संदर्भ बने।

अगर आपको किसी उत्तर का छोटा रूप मिल रहा है, तो उसी विषय के अगले प्रश्न और संबंधित विस्तृत लेख भी देखें। इससे नियम, अपवाद, समय, विधि और शास्त्रीय आधार जैसी बातें स्पष्ट होती हैं।

शुरुआत उन प्रश्न से करें जिनका शीर्षक आपके सवाल या उद्देश्य से सबसे अधिक मेल खाता है।

पढ़ते समय विधि, महत्व, समय और सावधानियों जैसे अलग-अलग पहलुओं को नोट करें, क्योंकि ये अक्सर अलग प्रविष्टियों में बँटे होते हैं।

अगर एक पेज से पूरा उत्तर न मिले, तो उसी संग्रह के अगले लेख या प्रश्न खोलकर संदर्भ पूरा करें।