विस्तृत उत्तर
स्कन्दपुराण (काशी खंड) के अनुसार, कालभैरव ने अपने नाखून से ब्रह्मा जी का निंदा करने वाला पांचवां सिर काट दिया था। चूंकि ब्रह्मा सृष्टिकर्ता (ब्राह्मण) थे, इसलिए भैरव पर 'ब्रह्महत्या' का पाप लग गया और कटा हुआ सिर उनके हाथ से चिपक गया। भगवान शिव के आदेश पर उन्होंने तीनों लोकों में भिक्षाटन किया। अंततः जब वे काशी (वाराणसी) पहुंचे, तो वहां पैर रखते ही ब्रह्महत्या पाताल में चली गई और ब्रह्मा का कपाल उनके हाथ से छूट गया। यह स्थान आज 'कपालमोचन तीर्थ' कहलाता है।





