विस्तृत उत्तर
पहला पिण्ड भगवान वराह की दाढ़ से गिरे मृदा अंश से बना था। शास्त्रीय आधार के अनुसार जब भगवान वराह ने हिरण्याक्ष नामक महादैत्य का वध कर पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला, तब उनके दाढ़ से पृथ्वी का कुछ मृदा-अंश दक्षिण दिशा की ओर छिटक कर गिरा।
इस मृदा अंश की विशेषता यह है कि यह स्वयं पृथ्वी का अंश था। मृदा अर्थात् मिट्टी, और मृदा अंश अर्थात् मिट्टी का छोटा भाग। यह कोई साधारण मिट्टी नहीं थी, बल्कि वह पृथ्वी की मिट्टी थी जिसे भगवान वराह ने रसातल से बाहर निकाला था। इसलिए यह दिव्य और पवित्र मृदा थी।
इस मृदा से पिण्डों के निर्माण की कथा अत्यंत रोचक है। उसी समय पितृ देवता वहाँ उपस्थित हुए और उन्होंने भगवान से प्रार्थना की। भगवान वराह ने उस मृदा अंश से तीन गोल पिण्डों का निर्माण किया और उन्हें कुशा के ऊपर दक्षिण दिशा की ओर स्थापित किया।
पहले पिण्डों की विशेषताएँ इस प्रकार हैं। पहली विशेषता है कि वे पृथ्वी की मृदा से बने थे। यह वह मृदा थी जिसे साक्षात् नारायण ने अपनी दाढ़ पर धारण किया था। इसलिए वह अत्यंत पवित्र थी। दूसरी विशेषता है कि वे गोलाकार थे। तीन गोल पिण्ड बने, और गोलाकार ही पिण्ड का स्वरूप है। तीसरी विशेषता है कि वे तीन की संख्या में थे। एक नहीं, दो नहीं, बल्कि तीन पिण्ड बने। चौथी विशेषता है कि वे कुशा के ऊपर स्थापित किए गए। कुशा की उत्पत्ति बाद में भगवान के दिव्य रोमों से हुई, परंतु पहले पिण्डों के लिए कुशा का प्रयोग हुआ था।
पहले पिण्डों का प्रतीकात्मक महत्व विशेष है। भगवान ने यह दिव्य उद्घोष किया कि ये तीन पिण्ड क्रमशः पिता, पितामह और प्रपितामह के शाश्वत प्रतीक माने जाएं। अर्थात् पहले पिण्डों ने ही तीन पीढ़ियों के पितरों का सम्मान स्थापित किया।
इस घटना के बाद तिल और कुशा की उत्पत्ति हुई। तदनंतर भगवान के शरीर से उत्पन्न पसीने की बूंदों से पृथ्वी पर काले तिल की उत्पत्ति हुई, और उनके दिव्य रोमों से पवित्र कुशा घास का प्रादुर्भाव हुआ। यही कारण है कि आज तक श्राद्ध कर्म में पिण्ड, काले तिल और कुशा को सबसे अनिवार्य और पवित्र माना जाता है, क्योंकि इनकी उत्पत्ति साक्षात् नारायण के शरीर से हुई है।
आज के पिण्डों की सामग्री विकसित हो गई है। आज पिण्ड पके हुए चावल, गाय का दूध, घी, शहद, जौ और काले तिल को मिलाकर बनाए जाते हैं, जो गोलाकार होते हैं। परंतु इनका मूल आधार वही पहला पिण्ड है, जिसे भगवान वराह ने बनाया था।
पहले पिण्ड का मृदा से बनना दार्शनिक रूप से भी विशेष है। पृथ्वी सब जीवों की माता है। उसी पृथ्वी की मृदा से पहले पिण्ड बने, जो पितरों के सम्मान का साधन थे। यह दर्शाता है कि पृथ्वी, पितर और मानव एक सूत्र में बंधे हैं।
दक्षिण दिशा का महत्व भी इस घटना से जुड़ा है। मृदा अंश दक्षिण दिशा की ओर छिटक कर गिरा। यही कारण है कि आज भी श्राद्ध में दक्षिण दिशा का विशेष महत्व है। शास्त्रों में दक्षिण दिशा को यमलोक और पितृलोक की दिशा माना गया है, और यह सम्बन्ध भगवान वराह की लीला से ही स्थापित हुआ।
पिण्डदान की परम्परा का प्रारंभ इस मृदा-निर्मित पहले पिण्ड से हुआ। संपूर्ण जगत में पिण्डदान की पवित्र परम्परा स्वयं भगवान विष्णु के वराह अवतार द्वारा प्रारंभ की गई थी। इसलिए हर बार जब कोई श्राद्ध में पिण्ड बनाता है, तो वह उस पहले मृदा-पिण्ड की परम्परा को जारी रखता है।
याज्ञवल्क्य स्मृति का स्पष्ट कथन है कि ये तीन पूर्वज क्रमशः वसु, रुद्र और आदित्य देवताओं के समान माने जाते हैं। यह सब भगवान वराह की उस लीला से प्रारंभ हुआ, जिसमें पहला पिण्ड मृदा से बना था। शास्त्रीय आधार के रूप में महाभारत का शांतिपर्व और अन्य वैदिक संहिताएँ इस कथा के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः पहला पिण्ड भगवान वराह की दाढ़ से दक्षिण दिशा की ओर गिरे पृथ्वी के मृदा अंश से बना था। यह वह मृदा थी जिसे भगवान ने रसातल से बाहर निकाला था, और इससे तीन गोलाकार पिण्ड बने, जो पिता, पितामह और प्रपितामह के प्रतीक थे।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





