विस्तृत उत्तर
पिण्डदान की शुरुआत स्वयं भगवान वराह ने की थी। शास्त्रीय आधार के अनुसार महाभारत के शांतिपर्व और अन्य वैदिक संहिताओं में यह प्रसंग आता है कि संपूर्ण जगत में पिण्डदान की पवित्र परम्परा स्वयं भगवान विष्णु के वराह अवतार द्वारा प्रारंभ की गई थी।
भगवान वराह के अवतार की कथा अत्यंत रोचक है। जब भगवान वराह ने हिरण्याक्ष नामक महादैत्य का वध कर पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला, तब उनके दाढ़ से पृथ्वी का कुछ मृदा-अंश दक्षिण दिशा की ओर छिटक कर गिरा। उसी समय पितृ देवता वहाँ उपस्थित हुए और उन्होंने भगवान से प्रार्थना की।
इस घटना के मुख्य अंग इस प्रकार हैं। पहली बात है हिरण्याक्ष का वध। हिरण्याक्ष एक महादैत्य था, जिसने पृथ्वी को रसातल में ले जाकर रख दिया था। भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर उसका वध किया। दूसरी बात है पृथ्वी को रसातल से बाहर निकालना। भगवान वराह ने अपनी दाढ़ पर पृथ्वी को धारण कर रसातल से बाहर निकाला। तीसरी बात है दाढ़ से मृदा-अंश का गिरना। पृथ्वी को निकालते समय भगवान की दाढ़ से कुछ मृदा अर्थात् मिट्टी का अंश दक्षिण दिशा की ओर गिरा। चौथी बात है पितृ देवताओं का प्रकट होना। उसी समय पितृ देवता प्रकट हुए और भगवान से प्रार्थना की।
भगवान वराह की दिव्य लीला आगे जारी है। भगवान वराह ने उस मृदा अंश से तीन गोल पिण्डों का निर्माण किया और उन्हें कुशा के ऊपर दक्षिण दिशा की ओर स्थापित किया। भगवान ने यह दिव्य उद्घोष किया कि ये तीन पिण्ड क्रमशः पिता, पितामह और प्रपितामह के शाश्वत प्रतीक माने जाएं।
इस उद्घोष का गहरा महत्व है। इसी दिव्य उद्घोष के कारण आज तक श्राद्ध में तीन पिण्ड बनाए जाते हैं, और तीनों को इन्हीं तीन पूर्वजों के शाश्वत प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। पिण्डदान की यह सम्पूर्ण परम्परा भगवान वराह की लीला से ही प्रारंभ हुई।
भगवान वराह की लीला से तिल और कुशा की उत्पत्ति भी हुई। तदनंतर भगवान के शरीर से उत्पन्न पसीने की बूंदों से पृथ्वी पर काले तिल की उत्पत्ति हुई, और उनके दिव्य रोमों से पवित्र कुशा घास का प्रादुर्भाव हुआ। यही कारण है कि आज तक श्राद्ध कर्म में पिण्ड, काले तिल और कुशा को सबसे अनिवार्य और पवित्र माना जाता है, क्योंकि इनकी उत्पत्ति साक्षात् नारायण के शरीर से हुई है।
इस कथा का दार्शनिक संदेश गहरा है। पिण्डदान केवल एक कर्मकाण्ड नहीं है, बल्कि साक्षात् भगवान विष्णु द्वारा प्रारंभ की गई दिव्य परम्परा है। श्राद्ध में जो भी सामग्री प्रयोग होती है, जैसे पिण्ड, काले तिल और कुशा, वह सब साक्षात् भगवान के शरीर से उत्पन्न है। इसलिए श्राद्ध एक अत्यंत पवित्र अनुष्ठान है।
भगवान वराह का अवतार धर्म-स्थापना के लिए था। हिरण्याक्ष का वध करना और पृथ्वी को बचाना उनकी पहली लीला थी। पिण्डदान की परम्परा प्रारंभ करना दूसरी लीला थी। दोनों लीलाएँ धर्म और लोक-कल्याण के लिए थीं।
पिण्डदान का यह दिव्य उद्भव दर्शाता है कि सनातन धर्म में हर अनुष्ठान का गहरा आध्यात्मिक आधार है। पितरों को पिण्ड क्यों दिए जाते हैं, क्यों तीन पिण्ड बनाए जाते हैं, क्यों दक्षिण दिशा में स्थापित किए जाते हैं, और क्यों कुशा-तिल का प्रयोग होता है, इन सब प्रश्नों का उत्तर भगवान वराह की इस कथा में है।
यह कथा तीन पीढ़ियों के पितरों के सम्मान का आधार भी है। याज्ञवल्क्य स्मृति का स्पष्ट कथन है कि ये तीन पूर्वज क्रमशः वसु, रुद्र और आदित्य देवताओं के समान माने जाते हैं। भगवान वराह के तीन पिण्डों के दिव्य उद्घोष से यह सिद्ध होता है कि तीन पीढ़ियों का सम्मान शाश्वत है।
पिण्डदान की परम्परा का व्यापक प्रभाव यह है कि यह सम्पूर्ण जगत में फैली है। महाभारत के शांतिपर्व में भी यह कथा है, और अन्य वैदिक संहिताओं में भी। इसलिए यह सनातन धर्म की मूल परम्पराओं में से एक है। शास्त्रीय आधार के रूप में महाभारत का शांतिपर्व और अन्य वैदिक संहिताएँ इस कथा के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः पिण्डदान की शुरुआत स्वयं भगवान विष्णु के वराह अवतार ने की थी। हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को रसातल से बाहर निकालते समय उनकी दाढ़ से गिरे मृदा अंश से तीन पिण्डों का निर्माण कर, उन्हें पिता, पितामह और प्रपितामह के शाश्वत प्रतीक के रूप में स्थापित किया।
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