विस्तृत उत्तर
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, पाण्डु पुत्र भीमसेन के पेट में 'वृक' नाम की एक विशेष जठराग्नि जलती थी, जिसके कारण वे भूख बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। जब महर्षि वेदव्यास ने पाण्डवों को साल की सभी 24 एकादशियों पर व्रत करने को कहा, तो भीमसेन बहुत परेशान हो गए। तब व्यास जी ने उन्हें छूट देते हुए केवल ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को 'निर्जल' (बिना पानी के) व्रत करने का निर्देश दिया। भीमसेन ने गर्मी में प्राण संकट में डालकर भी यह व्रत पूरा किया, इसलिए इसे 'भीमसेनी' या 'पाण्डव एकादशी' कहा जाता है।




