विस्तृत उत्तर
भगवान वराह ने पिण्डदान तब शुरू किया जब उन्होंने हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला। शास्त्रीय आधार के अनुसार जब भगवान वराह ने हिरण्याक्ष नामक महादैत्य का वध कर पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला, तब उनके दाढ़ से पृथ्वी का कुछ मृदा-अंश दक्षिण दिशा की ओर छिटक कर गिरा। उसी समय पितृ देवता वहाँ उपस्थित हुए और उन्होंने भगवान से प्रार्थना की।
इस ऐतिहासिक क्षण के तीन मुख्य अंग हैं। पहला अंग है हिरण्याक्ष का वध। हिरण्याक्ष एक महादैत्य था, जिसने अपने अत्याचारों से सम्पूर्ण लोक को कष्ट दिया था। भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर उसका वध किया। दूसरा अंग है पृथ्वी को रसातल से बाहर निकालना। हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को रसातल में डाल रखा था, और भगवान वराह ने अपनी दाढ़ पर उसे धारण कर बाहर निकाला। तीसरा अंग है मृदा अंश का गिरना। पृथ्वी को निकालते समय भगवान की दाढ़ से कुछ मृदा अर्थात् मिट्टी का अंश दक्षिण दिशा की ओर छिटक कर गिरा।
इस घटना के बाद की दिव्य लीला अत्यंत रोचक है। उसी समय पितृ देवता वहाँ उपस्थित हुए और उन्होंने भगवान से प्रार्थना की। भगवान वराह ने उस मृदा अंश से तीन गोल पिण्डों का निर्माण किया और उन्हें कुशा के ऊपर दक्षिण दिशा की ओर स्थापित किया। भगवान ने यह दिव्य उद्घोष किया कि ये तीन पिण्ड क्रमशः पिता, पितामह और प्रपितामह के शाश्वत प्रतीक माने जाएं।
यह वह क्षण है जब पिण्डदान की परम्परा प्रारंभ हुई। संपूर्ण जगत में पिण्डदान की पवित्र परम्परा स्वयं भगवान विष्णु के वराह अवतार द्वारा प्रारंभ की गई थी। इसलिए वराह अवतार का यह क्षण पिण्डदान के आरंभ का ऐतिहासिक क्षण है।
इस घटना के विशेष पहलू हैं। पहला पहलू है दक्षिण दिशा। मृदा अंश दक्षिण दिशा की ओर छिटक कर गिरा। यही कारण है कि आज भी श्राद्ध में दक्षिण दिशा का विशेष महत्व है, क्योंकि शास्त्रों में दक्षिण दिशा को यमलोक और पितृलोक की दिशा माना गया है। दूसरा पहलू है पितृ देवताओं का प्रकट होना। पितृ देवता उसी समय प्रकट हुए, जिसका अर्थ है कि पिण्डदान की परम्परा पितरों की प्रार्थना से ही प्रारंभ हुई। तीसरा पहलू है तीन पिण्डों का निर्माण। भगवान ने तीन गोल पिण्ड बनाए, जो आज भी श्राद्ध में बनाए जाते हैं। चौथा पहलू है कुशा का प्रयोग। पिण्डों को कुशा के ऊपर स्थापित किया गया, जो आज भी अनिवार्य है।
इसके बाद तिल और कुशा की उत्पत्ति भी हुई। तदनंतर भगवान के शरीर से उत्पन्न पसीने की बूंदों से पृथ्वी पर काले तिल की उत्पत्ति हुई, और उनके दिव्य रोमों से पवित्र कुशा घास का प्रादुर्भाव हुआ। यही कारण है कि आज तक श्राद्ध कर्म में पिण्ड, काले तिल और कुशा को सबसे अनिवार्य और पवित्र माना जाता है, क्योंकि इनकी उत्पत्ति साक्षात् नारायण के शरीर से हुई है।
इस घटना का धार्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह सिद्ध करता है कि पिण्डदान केवल मानव-निर्मित परम्परा नहीं है, बल्कि स्वयं भगवान द्वारा स्थापित दिव्य परम्परा है। हर बार जब कोई व्यक्ति श्राद्ध में पिण्डदान करता है, तो वह भगवान वराह की उसी लीला को साकार करता है।
यह घटना तीन पिण्डों की संख्या का आधार भी है। आज जो भी श्राद्ध में तीन पिण्ड बनाए जाते हैं, वे क्रमशः पिता, पितामह और प्रपितामह के प्रतीक होते हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति का स्पष्ट कथन है कि ये तीन पूर्वज क्रमशः वसु, रुद्र और आदित्य देवताओं के समान माने जाते हैं। यह सब भगवान वराह के दिव्य उद्घोष का परिणाम है।
वराह अवतार के समय का ऐतिहासिक संदर्भ देखें तो यह सत्ययुग या प्रलय काल का समय है, जब हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को कष्ट दिया था। भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर उसका वध किया, और इसी क्रम में पिण्डदान की परम्परा भी प्रारंभ की।
भगवान वराह की लीला का यह क्षण सनातन धर्म के लिए अमूल्य है। इस एक घटना से अनेक चीज़ें प्रारंभ हुईं। पिण्डदान की परम्परा, तिल की उत्पत्ति, कुशा की उत्पत्ति, और तीन पीढ़ियों के पितरों का सम्मान। ये सब आज भी श्राद्ध में अनिवार्य हैं। शास्त्रीय आधार के रूप में महाभारत का शांतिपर्व और अन्य वैदिक संहिताएँ इस कथा के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः भगवान वराह ने पिण्डदान तब शुरू किया, जब उन्होंने हिरण्याक्ष नामक महादैत्य का वध कर पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला। उनकी दाढ़ से दक्षिण दिशा की ओर गिरे मृदा अंश से तीन पिण्ड बनाकर, कुशा के ऊपर स्थापित कर, उन्हें पिता, पितामह और प्रपितामह के शाश्वत प्रतीक घोषित किया।
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