विस्तृत उत्तर
कुशा घास भगवान वराह के दिव्य रोमों से उत्पन्न हुई थी। शास्त्रीय आधार के अनुसार उनके दिव्य रोमों से पवित्र कुशा घास का प्रादुर्भाव हुआ।
इस उत्पत्ति का सम्पूर्ण संदर्भ देखें। यह घटना भगवान वराह की उस लीला के बाद हुई, जब उन्होंने हिरण्याक्ष का वध किया, पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला, और तीन पिण्डों का निर्माण कर पिण्डदान की परम्परा प्रारंभ की। तदनंतर भगवान के शरीर से उत्पन्न पसीने की बूंदों से पृथ्वी पर काले तिल की उत्पत्ति हुई, और उनके दिव्य रोमों से पवित्र कुशा घास का प्रादुर्भाव हुआ।
कुशा की उत्पत्ति का स्रोत विशेष है। ये भगवान के दिव्य रोमों से उत्पन्न हुई। दिव्य रोम अर्थात् पवित्र शरीर के बाल। भगवान वराह जब अपने वराह स्वरूप में थे, तब उनके शरीर पर रोम थे। उन्हीं दिव्य रोमों से कुशा का प्रादुर्भाव हुआ। प्रादुर्भाव अर्थात् प्रकट होना या उत्पन्न होना।
कुशा की पवित्रता का यह सबसे बड़ा प्रमाण है। यही कारण है कि आज तक श्राद्ध कर्म में पिण्ड, काले तिल और कुशा को सबसे अनिवार्य और पवित्र माना जाता है, क्योंकि इनकी उत्पत्ति साक्षात् नारायण के शरीर से हुई है। कुशा साक्षात् नारायण के शरीर से उत्पन्न होने के कारण अत्यंत पवित्र है।
श्राद्ध में कुशा का व्यापक प्रयोग है। पहला प्रयोग है तर्पण में। तर्पण में कर्ता अंजलि में शुद्ध जल, कुशा और काले तिल लेकर पितरों के गोत्र और नाम का उच्चारण करता है। दूसरा प्रयोग है पवित्री में। अनामिका अंगुली में कुशा घास से निर्मित पवित्री अर्थात् अंगूठी धारण करना अनिवार्य है। तीसरा प्रयोग है पिण्डदान में। वेदी पर कुशा बिछाकर उन पर तीन पीढ़ियों के प्रतीक स्वरूप तीन पिण्ड स्थापित किए जाते हैं।
कुशा का यह तीन प्रकार का प्रयोग सिद्ध करता है कि यह श्राद्ध की मूल सामग्री है। बिना कुशा के तर्पण नहीं हो सकता, पवित्री नहीं बन सकती, और पिण्डों की स्थापना भी नहीं हो सकती। यह सर्वत्र अनिवार्य है।
पहले पिण्डों के साथ भी कुशा का प्रयोग था। भगवान वराह ने पहले तीन गोल पिण्डों का निर्माण किया और उन्हें कुशा के ऊपर दक्षिण दिशा की ओर स्थापित किया। अर्थात् कुशा का प्रयोग पहले से ही था, और बाद में उसकी उत्पत्ति का स्पष्ट दिव्य आधार स्थापित हुआ।
पितरों को कुशा अत्यंत प्रिय है। विष्णु पुराण और मत्स्य पुराण के अनुसार पितरों को तिल, कुशा, गाय का दूध, शहद, जौ और सफेद फूल अत्यंत प्रिय हैं। कुशा का पितरों को प्रिय होना उसके दिव्य उद्भव से ही जुड़ा है, क्योंकि वह साक्षात् नारायण के शरीर के रोमों से उत्पन्न हुई है।
कुशा का दार्शनिक महत्व विशेष है। यह घास होते हुए भी अत्यंत पवित्र है, क्योंकि यह भगवान के शरीर से उत्पन्न हुई है। यह सिद्ध करता है कि कोई वस्तु अपनी बाह्य उपस्थिति से नहीं, बल्कि अपनी उत्पत्ति और प्रयोग से पवित्र होती है। साधारण घास साधारण है, परंतु कुशा साक्षात् नारायण के रोमों से उत्पन्न होने के कारण दिव्य है।
कुशा का प्रयोग सावधानी से करना चाहिए। श्राद्ध में कुशा को आदर के साथ बिछाया जाता है, और उस पर पिण्ड स्थापित किए जाते हैं। पवित्री बनाते समय कुशा को विधि से अंगूठी का रूप दिया जाता है। तर्पण में कुशा को जल और तिल के साथ लेकर पितरों के लिए अर्पित किया जाता है। हर प्रयोग में आदर और श्रद्धा आवश्यक है।
कुशा की दिशा भी विशेष है। पिण्डदान में कुशा को दक्षिण दिशा की ओर बिछाया जाता है, क्योंकि भगवान वराह ने भी पहले पिण्डों को कुशा पर दक्षिण दिशा की ओर स्थापित किया था। यह दिशा यमलोक और पितृलोक की दिशा है, और कुशा का प्रयोग इसी दिशा से जुड़ा है।
यह कथा सिद्ध करती है कि पिण्ड, काले तिल और कुशा तीनों ही साक्षात् भगवान विष्णु के वराह अवतार से उत्पन्न हुए हैं। तीनों के बिना श्राद्ध नहीं हो सकता, और इसी कारण ये तीनों अत्यंत पवित्र माने जाते हैं। शास्त्रीय आधार के रूप में महाभारत का शांतिपर्व और अन्य वैदिक संहिताएँ इस कथा के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः कुशा घास भगवान वराह के दिव्य रोमों से उत्पन्न हुई। जब उन्होंने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला, उसके बाद उनके दिव्य रोमों से पवित्र कुशा घास का प्रादुर्भाव हुआ। इसीलिए श्राद्ध में कुशा अत्यंत पवित्र और अनिवार्य मानी जाती है।
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