षष्ठी श्राद्ध: धर्मशास्त्रीय स्वरूप, विधान, फलमीमांसा एवं शास्त्रीय प्रमाण
उपोद्घात एवं श्राद्ध तत्त्व की पारलौकिक पृष्ठभूमि
सनातन धर्मशास्त्रों, गृह्यसूत्रों एवं पौराणिक संहिताओं में 'श्राद्ध' को केवल एक कर्मकाण्ड नहीं, अपितु जीव के पारलौकिक कल्याण, पितृ-ऋण से मुक्ति और वंश-परम्परा के संरक्षण का अभेद्य लौकिक एवं पारमार्थिक साधन माना गया है। भारतीय दर्शन में मृत्यु जीवन का अन्त नहीं, अपितु कर्मों की एक नवीन यात्रा का आरम्भ है। गरुड़ पुराण एवं विष्णु पुराण के गहन दार्शनिक विवेचन के अनुसार, शरीर त्यागने के पश्चात् जीवात्मा जब अपनी प्रेत योनि से पितृलोक की सुदीर्घ यात्रा करती है, तो उसके लिए भूलोक में उसके वंशजों द्वारा अर्पित पिण्ड और जल (तर्पण) ही 'पाथेय' अर्थात् मार्ग का सम्बल बनते हैं ।
महर्षि पराशर ने श्राद्ध के मूल स्वरूप को अत्यन्त स्पष्ट एवं वैज्ञानिक रूप में परिभाषित करते हुए कहा है:
भावार्थ यह है कि उचित देश (पवित्र स्थान एवं तीर्थ), उपयुक्त काल (कुतप आदि शास्त्र-निर्धारित मुहूर्त), और सुयोग्य पात्र (तपस्वी एवं सदाचारी ब्राह्मण) की प्राप्ति होने पर विधिपूर्वक, हविष्य (पवित्र अन्न), तिल, कुशा और वैदिक मन्त्रों के द्वारा जो कर्म 'श्रद्धा' के साथ सम्पन्न किया जाता है, वही यथार्थ में श्राद्ध है । ब्रह्मपुराण में भी इसी परिभाषा का समर्थन करते हुए उद्घोष किया गया है कि देश, काल और पात्र में पितरों को उद्देश्य करके श्रद्धा और विधि से जो ब्राह्मणों को दिया जाता है, वह श्राद्ध है ।
पितृपक्ष (महालया) के 16 दिनों का कालखण्ड सम्पूर्ण वर्ष में सर्वाधिक पावन माना गया है। वायु पुराण और ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार पितरों का एक अहोरात्र (दिन-रात) मनुष्यों के एक मास के बराबर होता है, जिसमें कृष्ण पक्ष उनका दिन (कर्मकाल) और शुक्ल पक्ष उनकी रात्रि (शयनकाल) है । इसी कारण आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को पितरों के लिए विशेष रूप से निर्धारित किया गया है। इस महालय पक्ष में प्रत्येक तिथि का अपना एक विशिष्ट ब्रह्माण्डीय महत्त्व, भिन्न धर्मशास्त्रीय विधान और पृथक् फल है। इन तिथियों में 'षष्ठी तिथि' (आश्विन कृष्ण षष्ठी) का श्राद्ध एक अत्यन्त गुह्य, विशिष्ट और बहुआयामी कर्म है, जो पारम्परिक कर्मकाण्ड के साथ-साथ अनेक गम्भीर धर्मशास्त्रीय रहस्यों को समेटे हुए है। इस शोध-प्रपत्र में हम "षष्ठी श्राद्ध" के प्रत्येक धर्मशास्त्रीय आयाम— इसके अधिकारी, बाल्यावस्था एवं अकाल मृत्यु के नियम, ब्राह्मण चयन की अर्हता, पञ्चबलि का सिद्धान्त, गया तीर्थ के विशेष परिप्रेक्ष्य में इससे जुड़ी प्रामाणिक कथाओं, तथा याज्ञवल्क्य स्मृति, गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण व स्कन्द पुराण आदि के आलोक में इसके फल का गहन विश्लेषण करेंगे।
षष्ठी श्राद्ध का शास्त्रीय आधार एवं पारलौकिक तन्त्र
भारतीय कालगणना और पञ्चाङ्ग व्यवस्था में तिथियों का सीधा सम्बन्ध चन्द्रमा की कलाओं, सूर्य की रश्मियों और पितृलोक के सूक्ष्म स्पन्दनों से माना गया है। श्राद्ध कर्म की सम्पूर्ण संरचना इस सिद्धान्त पर आधारित है कि अर्पित किया गया अन्न और जल किस मार्ग से और किनके माध्यम से पितरों तक पहुँचता है।
श्राद्ध कर्म में केवल हमारे नाम, गोत्र और रूप वाले लौकिक पूर्वज (पिता, पितामह, प्रपितामह) ही हविष्य के प्रत्यक्ष भोक्ता नहीं होते। याज्ञवल्क्य स्मृति और गरुड़ पुराण के अनुसार, श्राद्ध के वास्तविक और अधिष्ठाता देव 'वसु', 'रुद्र' और 'आदित्य' हैं । धर्मशास्त्रों का स्पष्ट निर्देश है: "वसु रुद्रादित्यासुताः पितरः श्राद्धदेवताः।" इस श्लोकांश का निहितार्थ यह है कि पिता 'वसु' स्वरूप हैं, पितामह (दादा) 'रुद्र' स्वरूप हैं, और प्रपितामह (परदादा) 'आदित्य' (सूर्य) स्वरूप माने गए हैं । जब षष्ठी तिथि पर श्राद्ध किया जाता है, तो मन्त्रों और कुशा के माध्यम से अर्पित पिण्ड सर्वप्रथम इन अधीक्षक देवताओं (वसु, रुद्र, आदित्य) को प्राप्त होता है। ये देवता मन्त्रों की शक्ति और संकल्प के माध्यम से उस हविष्य को रूपान्तरित करके पितरों को उसी लोक और उसी योनि के अनुरूप प्रदान करते हैं, जहाँ वे अपने कर्मानुसार निवास कर रहे होते हैं। यदि कोई पूर्वज देव योनि में है, तो उसे वह अन्न 'अमृत' के रूप में, पशु योनि में 'तृण' के रूप में, और दानव योनि में 'मांस' के रूप में प्राप्त होता है। यह व्यवस्था सिद्ध करती है कि षष्ठी श्राद्ध कोई प्रतीकात्मक परम्परा नहीं, अपितु एक अत्यन्त सुव्यवस्थित सूक्ष्म-वैज्ञानिक तन्त्र है।
षष्ठी श्राद्ध मुख्य रूप से महालय पक्ष (पितृपक्ष) के छठे दिन (आश्विन कृष्ण षष्ठी) को किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण पार्वण श्राद्ध है । इसे कई अंचलों में 'छठ श्राद्ध' भी कहा जाता है । इस दिन मुख्य रूप से उन पूर्वजों का आवाहन किया जाता है जिनका देहावसान वर्ष के किसी भी मास की षष्ठी तिथि को हुआ हो।
षष्ठी तिथि के अधिकारी: किन पितरों का श्राद्ध किया जाता है?
धर्मशास्त्रों में इस बात का अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन प्राप्त होता है कि पितृपक्ष की किस तिथि पर किस पितर का श्राद्ध होना चाहिए। श्राद्ध का अधिकारी कौन है और वह किस दिन अपना भाग ग्रहण करने का अधिकारी बनता है, इसके कुछ निश्चित नियम हैं। षष्ठी श्राद्ध के लिए शास्त्रों में निम्नलिखित अधिकारियों का स्पष्ट निर्देश है:
मृत्यु तिथि का पारम्परिक विधान
श्राद्ध के मूल और सर्वमान्य नियम के अनुसार, "जिस तिथि को प्राणी का देहावसान होता है, उसी तिथि को उसका वार्षिक (क्षयाह) तथा पितृपक्षीय श्राद्ध किया जाना चाहिए।" । इस सन्दर्भ में समाज में प्रायः यह भ्रांति रहती है कि श्राद्ध मृत्यु के दिन होना चाहिए या दाह-संस्कार के दिन। धर्मसिन्धु, निर्णयसिन्धु और गरुड़ पुराण जैसे ग्रन्थों के प्रमाण इस बात की अकाट्य पुष्टि करते हैं कि व्यक्ति की जिस दिन मृत्यु होती है, उस दिन और उस समय विशेष पर जो वास्तविक तिथि (जैसे कृष्ण या शुक्ल पक्ष की षष्ठी) व्याप्त होती है, वही श्राद्ध की प्रामाणिक तिथि मानी जाती है । दाह-संस्कार की तिथि का श्राद्ध-कर्म में कोई विशेष महत्त्व नहीं होता ।
अतएव, यदि किसी व्यक्ति के माता, पिता, अथवा किसी भी पूर्वज का निधन वर्ष के किसी भी मास (चैत्र से फाल्गुन तक) के शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष की 'षष्ठी' तिथि को हुआ हो, तो महालय (पितृपक्ष) में उनका पार्वण श्राद्ध आश्विन कृष्ण षष्ठी को ही शास्त्रसम्मत रूप से सम्पन्न किया जाना चाहिए । इस दिन किया गया श्राद्ध सीधे उस मृत आत्मा को प्राप्त होता है और उसे परलोक में तृप्ति प्रदान करता है।
मातृकाओं एवं मातृ-पक्ष का विशेष श्राद्ध
विभिन्न पञ्चाङ्गों एवं कर्मकाण्ड ग्रन्थों के अनुसार, यद्यपि नवमी तिथि (मातृ नवमी) माता के श्राद्ध के लिए सर्वाधिक विख्यात है, तथापि कुछ विशिष्ट शास्त्रीय परम्पराओं और गृह्यसूत्रों के भाष्य में षष्ठी तिथि को "मातृकाओं" (मातृवर्ग) के विशिष्ट श्राद्ध के लिए भी उपयुक्त माना गया है । स्कन्द पुराण के अनुसार षष्ठी तिथि के अधिपति और स्वामी भगवान कार्तिकेय (स्कन्द) हैं, जो देवसेनापति होने के साथ-साथ समस्त मातृकाओं के पालक और रक्षक भी माने गए हैं । अतः इस दिन मातृ-शक्ति और मातृकाओं के निमित्त तर्पण करने से वंश वृद्धि होती है और सन्तति की समस्त अरिष्टों से रक्षा होती है। जो लोग अपने ननिहाल पक्ष के लिए विशेष तर्पण करना चाहते हैं, वे भी इस तिथि की ऊर्जा का लाभ उठाते हैं。
बाल्यावस्था मृत्यु के परिप्रेक्ष्य में षष्ठी श्राद्ध का शास्त्रीय विवेचन
श्राद्ध-तत्त्व और धर्मसिन्धु आदि ग्रन्थों में मृत्यु की अवस्था (आयु) के आधार पर श्राद्ध के नियमों में गम्भीर भेद बताया गया है। समाज में यह एक ज्वलन्त प्रश्न रहता है कि यदि किसी बालक या बालिका की मृत्यु बाल्यावस्था में हो जाए और उसकी मृत्यु तिथि षष्ठी हो, तो क्या उसका श्राद्ध पितृपक्ष की षष्ठी तिथि को किया जाएगा? शास्त्रों का इस पर अत्यन्त सूक्ष्म और वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, जो आयु के विभिन्न चरणों और सम्पन्न हुए संस्कारों पर निर्भर करता है ।
बालावस्था में मृत्यु के सन्दर्भ में विभिन्न आयु-वर्गों के लिए निर्धारित शास्त्रीय नियम और उनकी षष्ठी तिथि से सम्बद्धता को समझने के लिए निम्नलिखित वर्गीकरण आवश्यक है:
| बाल्यावस्था का आयु-वर्ग एवं संस्कार स्थिति | श्राद्ध का शास्त्रीय विधान एवं प्रक्रिया | षष्ठी तिथि (पितृपक्ष) पर श्राद्ध की स्थिति |
|---|---|---|
| जन्म से 2 वर्ष तक (गर्भस्थ शिशु सहित) | गरुड़ पुराण एवं धर्मशास्त्रों के अनुसार, यदि दाँत निकलने या नामकरण से पूर्व (2 वर्ष से कम) शिशु की मृत्यु होती है, तो उसके लिए अग्निदाह, सपिण्डीकरण, पिण्डदान और तर्पण का पूर्णतः निषेध है। उन्हें भूमिदाह (दफनाना) दिया जाता है। | इनके लिए षष्ठी तिथि या किसी भी अन्य तिथि पर पार्वण श्राद्ध नहीं किया जाता। ये पितृपक्ष में केवल मार्जन के जल से ही तृप्त हो जाते हैं। |
| 2 वर्ष से 6 वर्ष तक (चूड़ाकर्म तक) | इस अवस्था में मृत बालकों के लिए पूर्ण पार्वण श्राद्ध नहीं किया जाता, अपितु केवल "मलिन षोडशी" कर्म किया जाता है। मृत्यु के छठे और दसवें दिन पिण्डदान होता है। | पितृपक्ष में इनका श्राद्ध सामान्यतः त्रयोदशी (13वीं तिथि) को करने का विधान है । षष्ठी को इनका श्राद्ध अनुशंसित नहीं है। |
| 6 वर्ष से अधिक (किन्तु उपनयन से पूर्व) | इस अवस्था के बालकों के लिए भी केवल 'मलिन षोडशी' का ही विधान है। यदि कन्या हो और 10 वर्ष से कम हो (अविवाहिता), तो भी यही नियम लागू होता है। | इनका श्राद्ध भी मुख्य रूप से बाल-मृत्यु के लिए निर्धारित 'त्रयोदशी' तिथि या 'कुंवारा पंचमी' को किया जाता है। |
| किशोरावस्था/युवावस्था (उपनयन संस्कार के पश्चात्) | यदि बालक का उपनयन (यज्ञोपवीत/जनेऊ) संस्कार हो चुका था, तो उसके शरीर में सप्त धातुएँ पुष्ट मानी जाती हैं। उसे पूर्ण वयस्क के समान माना जाता है। उसका दशगात्र, सपिण्डीकरण और पूर्ण श्राद्ध अनिवार्य है । | हाँ, यदि ऐसे उपनीत किशोर की मृत्यु षष्ठी तिथि को हुई है, तो उसका पूर्ण विधि-विधान से पार्वण श्राद्ध पितृपक्ष की षष्ठी तिथि को ही किया जाएगा । |
ब्रह्म पुराण और गरुड़ पुराण में स्पष्ट वर्णन है कि जिन शिशुओं की बाल्यावस्था में ही मृत्यु हो गई हो और जो पिण्डदान के अधिकारी नहीं बन पाए, वे श्राद्धकर्ता द्वारा श्राद्ध करते समय कुशा और मन्त्रों से मार्जन किए गए जल (सम्मार्जन जल) की गिरी हुई नन्हीं-नन्हीं बूँदों से ही तृप्त हो जाते हैं । अतः उनके लिए पृथक् रूप से षष्ठी तिथि का आग्रह शास्त्रसम्मत नहीं है।
अकाल मृत्यु (अपमृत्यु) और षष्ठी तिथि: शास्त्रीय निषेध
बाल्यावस्था की भाँति ही अकाल मृत्यु के सन्दर्भ में भी धर्मशास्त्रों ने तिथियों का कठोर निर्धारण किया है। अकाल मृत्यु (अपमृत्यु) का अर्थ है— आयु पूर्ण होने से पूर्व किसी दुर्घटना, शस्त्र-घात, विषपान, जल में डूबने, सर्पदंश, अग्नि में जलने, किसी हिंसक पशु के आक्रमण, अथवा आत्महत्या के कारण प्राण त्यागना । गरुड़ पुराण के प्रेतखण्ड (अध्याय 40) में भगवान विष्णु गरुड़ को स्पष्ट करते हैं कि जो ब्राह्मण या कोई भी मनुष्य अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है, वह भयंकर नरक और प्रेत योनि को प्राप्त करता है ।
यहाँ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय नियम यह है कि अकाल मृत्यु प्राप्त जीवों का श्राद्ध षष्ठी तिथि को कदापि नहीं किया जाता है, भले ही उनकी मृत्यु षष्ठी तिथि को ही क्यों न हुई हो ।
स्कन्द पुराण के नागरखण्ड (अध्याय 222) में इसका स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध है: "येषां च शस्त्रमृत्युः स्यादपमृत्युरथापि वा।" अर्थात्, जिनकी मृत्यु शस्त्रों से या अपमृत्यु (दुर्घटना आदि) से हुई है, उनका एकोद्दिष्ट या पार्वण श्राद्ध पितृपक्ष की केवल चतुर्दशी (14वीं तिथि) को ही किया जाना चाहिए ।
इसका कारण भी स्कन्द पुराण में वर्णित है। ब्रह्मा जी ने असुरों को यह वरदान दिया था कि चतुर्दशी तिथि को अर्पित किया जाने वाला समस्त श्राद्ध का अन्न भूत, प्रेत और पिशाचों को प्राप्त होगा। चूँकि अकाल मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति सामान्यतः अपनी वासनाओं के कारण लम्बे समय तक 'प्रेत' योनि में ही भटकते हैं, अतः उनके उद्धार और शान्ति के लिए चतुर्दशी तिथि ही सर्वाधिक उपयुक्त मानी गई है । यदि कोई व्यक्ति अज्ञानतावश अपने दुर्घटना-मृत पूर्वज का श्राद्ध षष्ठी तिथि को करता है, तो वह अन्न पितरों को प्राप्त नहीं होता और वे क्षुधा से पीड़ित होकर श्राप देते हैं। अतः षष्ठी श्राद्ध केवल और केवल स्वाभाविक मृत्यु प्राप्त (जिनकी आयु पूर्ण हो चुकी थी या जो बिना किसी हिंसक घटना के रोग या वृद्धावस्था से मरे हों) पितरों के लिए ही शास्त्रसम्मत है।
षष्ठी श्राद्ध का विशिष्ट फल: "पूज्यता" और लौकिक सम्पदा
विभिन्न स्मृतियों और पुराणों में श्राद्ध के सामान्य फलों— यथा आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग और कीर्ति — का तो विशद वर्णन है ही, परन्तु महर्षि याज्ञवल्क्य और मार्कण्डेय पुराण ने पितृपक्ष की भिन्न-भिन्न तिथियों पर श्राद्ध करने के सर्वथा भिन्न और विशिष्ट फलों की अत्यन्त वैज्ञानिक 'फलमीमांसा' प्रस्तुत की है।
याज्ञवल्क्य स्मृति का मत: "पूज्यता" की प्राप्ति
याज्ञवल्क्य स्मृति के आचाराध्याय के श्राद्ध प्रकरण में महर्षि याज्ञवल्क्य ने तिथिवार श्राद्ध के फलों का जो श्लोकबद्ध वर्णन किया है, वह सम्पूर्ण धर्मशास्त्र में अद्वितीय है। षष्ठी तिथि के सन्दर्भ में उनका स्पष्ट उद्घोष है:
इस श्लोकांश का गहन अर्थ यह है कि जो व्यक्ति षष्ठी तिथि के दिन अपने पितरों का विधि-विधान और पूर्ण श्रद्धा के साथ पार्वण श्राद्ध सम्पन्न करता है, उसे इस लोक और परलोक में "पूज्यता" प्राप्त होती है ।
यहाँ 'पूज्यता' शब्द केवल सामान्य आदर का सूचक नहीं है। धर्मशास्त्रों में पूज्यता का अर्थ है समाज में एक ऐसा निष्कलंक यश और वर्चस्व प्राप्त करना, जहाँ शत्रु भी व्यक्ति के गुणों की वन्दना करें। जो व्यक्ति षष्ठी तिथि का श्राद्ध करता है, उसका समाज में यश कभी क्षीण नहीं होता और वह सर्वत्र सम्मान का अधिकारी बनता है। यदि किसी व्यक्ति को समाज में पद, प्रतिष्ठा, सम्मान की अकारण हानि हो रही हो, उसके ऊपर झूठे कलंक लग रहे हों, या उसे अपने कर्मक्षेत्र में निरन्तर अपमान का घूँट पीना पड़ रहा हो, तो धर्मशास्त्रों का निर्देश है कि उसे पितृपक्ष की षष्ठी तिथि को अपने ज्ञात-अज्ञात पितरों का विधिपूर्वक श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। इस दिन पितरों के आशीर्वाद से व्यक्ति के सम्मान पर लगा ग्रहण कट जाता है और उसे पुनः पूज्यता प्राप्त होती है।
इस तिथि के फल का एक अन्य आयाम यह है कि षष्ठी श्राद्ध करने वाले व्यक्ति का अपने ही कुल और परिवार में वर्चस्व स्थापित होता है, और उसके अनुज, पुत्र तथा परिवार के अन्य सदस्य उसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करते। यह सम्मान और पूज्यता पितरों के सूक्ष्म आशीर्वाद का ही प्रत्यक्ष प्रकटीकरण है।
मार्कण्डेय पुराण एवं विष्णु पुराण का दृष्टिकोण
मार्कण्डेय पुराण में पितृपक्ष के श्राद्ध का फल बताते हुए स्पष्ट कहा गया है कि श्राद्ध से तृप्त होकर पितृगण अपने श्राद्धकर्ता को दीर्घायु, सन्तति, प्रचुर धन, श्रेष्ठ विद्या, राज्यसुख, स्वर्ग और अन्ततः मोक्ष प्रदान करते हैं । मार्कण्डेय पुराण के अनुसार पितृदेव जब सन्तुष्ट होते हैं तो वे कर्ता के सभी पूर्व कर्म जनित संघर्षों को न्यून कर देते हैं।
विष्णु पुराण में षष्ठी तिथि के श्राद्ध के फल को स्पष्ट करते हुए यह चेतावनी भी दी गई है कि यदि कोई सामर्थ्यवान व्यक्ति अज्ञानवश या लोभवश श्राद्ध नहीं करता, तो उसके पितर पाथेय (यात्रा के भोजन) के अभाव में भयंकर कष्ट भोगते हैं। वे भूखे और प्यासे रहकर वायु रूप में अपने पुराने घर के द्वार पर आते हैं, और सूर्यास्त तक प्रतीक्षा करने के पश्चात निराश होकर अपने ही वंशजों का रक्त पीकर या उन्हें दारुण शाप देकर लौट जाते हैं । इसके विपरीत, जो व्यक्ति षष्ठी को विधिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराता है, उसके कुल में कभी दरिद्रता और अकाल मृत्यु का प्रवेश नहीं होता ।
विष्णु धर्मसूत्र के अनुसार, षष्ठी तिथि को श्राद्ध करने से घर-परिवार में होने वाले भयंकर और असाध्य रोगों का शमन होता है । यह तिथि स्वास्थ्य और आरोग्य की दृष्टि से भी अत्यन्त कल्याणकारी मानी गई है। जिन परिवारों में कोई न कोई सदस्य निरन्तर अस्वस्थ रहता हो, उन्हें षष्ठी तिथि पर तिल और कुशा से विशेष तर्पण करना चाहिए।
षष्ठी श्राद्ध की शास्त्रोक्त विधि: एक समग्र विवेचन
शास्त्रों में श्राद्ध की प्रक्रिया को अत्यन्त सूक्ष्म, नियमबद्ध और मन्त्र-प्रधान बताया गया है। गरुड़ पुराण, याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति और श्राद्ध तत्त्व जैसे ग्रन्थों के अनुसार षष्ठी श्राद्ध की सम्पूर्ण विधि को सामान्यतया निम्नलिखित चरणों में विभक्त किया जा सकता है:
1. देश, काल और मुहूर्त का निर्धारण
श्राद्ध कर्म में 'काल' (समय) का सर्वाधिक महत्त्व है। श्राद्ध कभी भी प्रातःकाल या रात्रिकाल में नहीं किया जाता। पितरों का समय मध्याह्न काल माना गया है। गरुड़ पुराण और धर्मसिन्धु के अनुसार, 'कुतप मुहूर्त' और 'रौहिण मुहूर्त' श्राद्ध के लिए सर्वोत्तम और सर्वमान्य काल हैं । कुतप मुहूर्त दिन का आठवाँ मुहूर्त होता है (जो सामान्यतः पूर्वाह्न 11:36 से 12:24 तक व्याप्त रहता है), और इसके ठीक पश्चात् रौहिण मुहूर्त (12:24 से 01:12 तक) आता है । 'कुतप' शब्द का अर्थ है— 'कु' अर्थात् पाप, और 'तप' अर्थात् जलाना। जो मुहूर्त समस्त पापों और दोषों को जलाकर भस्म कर दे, वह कुतप है। यदि इन मुहूर्तों में श्राद्ध आरम्भ न हो सके, तो 'अपरान्ह काल' (दोपहर 01:21 से 03:42 तक) में भी इसे सम्पन्न किया जा सकता है ।
स्थान के सन्दर्भ में, यदि सम्भव हो तो श्राद्ध किसी तीर्थ (जैसे गया, प्रयाग, काशी) या पवित्र नदी के तट पर करना चाहिए। यदि यह सम्भव न हो, तो घर की दक्षिण दिशा (जो यम और पितरों की दिशा है) को शुद्ध करके, गाय के गोबर (गोमय) से वेदी का निर्माण करना चाहिए。
2. सुपात्र ब्राह्मण का चयन एवं संख्या-विधान
श्राद्ध में ब्राह्मण केवल भोजन करने वाला व्यक्ति नहीं है, अपितु वह उस वेदी पर देव और पितरों का साक्षात् प्रतिनिधि है। याज्ञवल्क्य स्मृति (अध्याय 1, श्लोक 200) ब्राह्मण की 'पात्रता' का अत्यन्त कड़ा निर्देश देती है:
इसका अर्थ है कि केवल विद्या (वेदों का अध्ययन) कर लेने मात्र से, या केवल तपस्या (शारीरिक कष्ट सहन) करने मात्र से कोई ब्राह्मण श्राद्ध का हविष्य ग्रहण करने योग्य नहीं हो जाता। जिस ब्राह्मण में अच्छा आचरण (वृत्त), विद्या और तप— ये तीनों गुण विद्यमान हों, शास्त्रों में उसी को 'पूर्ण पात्र' कहा गया है । यदि श्राद्ध का अन्न किसी चरित्रहीन, ब्याज का धंधा करने वाले, मद्यपान करने वाले, या मूर्ख ब्राह्मण को खिलाया जाए, तो गरुड़ पुराण के अनुसार वह श्राद्ध निष्फल हो जाता है और पितरों को प्राप्त नहीं होता ।
ब्राह्मणों की संख्या के विषय में भी स्कन्द पुराण और यम स्मृति में कड़े नियम हैं। पार्वण श्राद्ध (जो पितृपक्ष में किया जाता है) में ब्राह्मणों की संख्या सदैव 'विषम' होनी चाहिए— यथा 1, 3, 5 या 7 । सम संख्या (2, 4, 8) में ब्राह्मणों को भोजन कराना पूर्णतः निषिद्ध है । षष्ठी श्राद्ध में यजमान को अपनी सामर्थ्य के अनुसार न्यूनतम एक सुपात्र ब्राह्मण अथवा 3, 5, या 7 ब्राह्मणों को निमन्त्रित कर विधिपूर्वक आसन पर बैठाकर भोजन कराना चाहिए । एकोद्दिष्ट श्राद्ध (जो मृत्यु के दिन किया जाता है) में केवल एक ब्राह्मण का विधान है ।
3. पञ्चबलि विधान: सृष्टि के समस्त जीवों के प्रति कृतज्ञता
श्राद्ध का अन्न ब्राह्मण को परोसने से पूर्व, उस पवित्र हविष्य को पाँच विशेष स्थानों पर निकाला जाता है, जिसे धर्मशास्त्रों में 'पञ्चबलि' कहा गया है। यह पञ्चबलि सनातन धर्म की उस महान वैश्चिक दृष्टि का परिचायक है, जिसमें मनुष्य केवल अपने पूर्वजों तक सीमित न रहकर सृष्टि के समस्त प्राणियों और देवताओं के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता है।
| बलि का प्रकार | ग्रास का अधिकारी | धर्मशास्त्रीय उद्देश्य एवं कारण |
|---|---|---|
| गोबलि | गाय (गौ माता) | गरुड़ पुराण के अनुसार गाय ही जीवात्मा को भयंकर 'वैतरणी नदी' पार कराती है। गाय के शरीर में समस्त देवताओं का वास है, अतः उसे दिया गया ग्रास सीधे देवताओं को तृप्त करता है । |
| श्वानबलि | कुत्ता | यमराज के दो भयानक श्वान (श्याम और शबल) होते हैं जो मृत्यु मार्ग के रक्षक हैं। इन्हें अन्न देने से मृत्यु के उपरान्त जीव का मार्ग निरापद होता है। |
| काकबलि | कौआ | कौए को यमलोक का प्रतीक और पितरों का साक्षात् सन्देशवाहक माना जाता है। यजमान घर की छत पर जाकर "कोबस-कोबस" कहकर कौए का आवाहन करता है । कौए का भोजन ग्रहण करना पितरों की सन्तुष्टि का प्रमाण माना जाता है। |
| पिपीलिकाबलि | चींटी एवं कीट | संसार के उन समस्त सूक्ष्म जीवों की तृप्ति के लिए, जो अदृश्य रहकर सृष्टि का चक्र चलाते हैं। अन्न को चींटियों के बिल के समीप रखा जाता है । |
| अग्निबलि | देवगण (अग्नि) | घी के साथ पके हुए भोजन के 5 ग्रास अग्नि में आहुति के रूप में डाले जाते हैं। अग्नि देवताओं का मुख है। देवताओं के सन्तुष्ट होने पर ही पितृ प्रसन्न होते हैं । |
4. पिण्डदान, तर्पण एवं निषिद्ध वस्तुएँ
पञ्चबलि के उपरान्त पिण्डदान की प्रक्रिया आरम्भ होती है। पके हुए चावल, गाय का दूध, काले तिल, शुद्ध घी और शहद को मिश्रित करके गोलाकार 'पिण्ड' निर्मित किए जाते हैं । विज्ञान और परम्परा दोनों यह मानते हैं कि ये पिण्ड उन गुणसूत्रों के प्रतीक हैं जो पितृकुल और मातृकुल से यजमान के शरीर में आए हैं । पिण्डदान के पश्चात् कुशा और काले तिल के साथ जल से अञ्जलि देकर तर्पण किया जाता है। काले तिल पितरों को अत्यन्त प्रिय हैं और उनके बिना कोई भी श्राद्ध पूर्ण नहीं माना जाता।
इस दिन आचार-संहिता का कड़ाई से पालन आवश्यक है। श्राद्ध के भोजन में लौहे या स्टील के बर्तनों का प्रयोग पूर्णतः वर्जित है। लोहे के पात्रों में पकाया गया भोजन प्रेतों को जाता है। इसके स्थान पर पत्तल (विशेषकर पलाश के पत्ते), मिट्टी या ताँबे/काँसे के पात्रों का प्रयोग शास्त्रसम्मत है । भोजन में बैंगन, प्याज, लहसुन, बासी अन्न, सत्तू, काला नमक और मूली का प्रयोग सर्वथा निषिद्ध है । श्राद्धकर्ता को इस दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और घर में किसी भी प्रकार का कलह या विवाद नहीं करना चाहिए, अन्यथा पितर निराश होकर लौट जाते हैं ।
5. ब्राह्मण भोजन एवं विसर्जन
ब्राह्मणों को पूर्ण आदर के साथ आसन पर बैठाकर मौन रूप से भोजन कराना चाहिए । गरुड़ पुराण के अनुसार यदि ब्राह्मण भोजन करते समय वार्तालाप करते हैं या भोजन की निन्दा करते हैं, तो वह अन्न पितरों को प्राप्त नहीं होता। भोजन के उपरान्त ब्राह्मणों को ताम्बूल (पान), यथाशक्ति दक्षिणा (स्वर्ण, रजत, या द्रव्य) और वस्त्रादि का दान करके उनकी प्रदक्षिणा करनी चाहिए। ब्राह्मणों के मुख से निकला हुआ आशीर्वाद ("स्वधास्तु", "तृप्ताः स्मः") साक्षात् भगवान का आशीर्वाद होता है और वह सीधे पितरों तक पहुँचता है । अन्त में 'विश्वेदेवा' और पितरों का विसर्जन किया जाता है।
प्रामाणिक कथा एवं दृष्टान्त: गया तीर्थ में भीष्म और श्रीराम का श्राद्ध
"षष्ठी श्राद्ध" के सन्दर्भ में शास्त्रों और पुराणों में एक अत्यन्त पावन और प्रामाणिक प्रसंग मोक्षदायिनी भूमि गया तीर्थ (विष्णुपद) का आता है, जहाँ भीष्म पितामह और भगवान श्रीराम ने अपने पूर्वजों का श्राद्ध किया था । आश्विन कृष्ण पक्ष की पंचमी, षष्ठी, सप्तमी एवं अष्टमी के दिनों में गया के विष्णुपद, रुद्रपद और ब्रह्मपद पर पिण्डदान का विशेष और अनन्त माहात्म्य बताया गया है ।
भीष्म पितामह की धर्म-निष्ठा का प्रसंग: पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत के युद्ध के पश्चात् या अपने जीवन काल में किसी अवसर पर, भीष्म पितामह अपने पिता महाराज शान्तनु के निमित्त श्राद्ध करने हेतु गया तीर्थ पहुँचे । आश्विन कृष्ण पक्ष की तिथियों (जिसमें षष्ठी का विशेष महत्त्व है) में जब वे फल्गु नदी के पावन तट पर स्थित विष्णुपद वेदी पर मन्त्रोच्चारण के साथ पिण्डदान करने के लिए उद्यत हुए, तो वहाँ एक अत्यन्त अद्भुत और अकल्पनीय घटना घटी।
मन्त्रों की शक्ति और पुत्र की अगाध श्रद्धा से आकृष्ट होकर, साक्षात् महाराज शान्तनु का हाथ वेदी की भूमि चीरकर बाहर प्रकट हो गया। शान्तनु की आत्मा ने अपने आज्ञाकारी पुत्र भीष्म से स्नेहवश आग्रह किया कि वह पिण्ड को वेदी पर रखने के बजाय सीधे उनके हाथ में रख दे ।
यहाँ भीष्म के सम्मुख एक भयंकर धर्मसंकट उपस्थित हो गया। एक ओर पिता का साक्षात् हाथ और पुत्र का अगाध मोह था, और दूसरी ओर कठोर धर्मशास्त्र का नियम। श्राद्ध का स्पष्ट शास्त्रीय विधान है कि पिण्ड 'कुशा' के आसन पर, वेदी (विष्णुपद) पर ही स्थापित किया जाना चाहिए, साक्षात् हाथ में नहीं। जो पिण्ड हाथ में दिया जाता है, वह शास्त्र विरुद्ध होने के कारण पितरों को चिरस्थायी तृप्ति नहीं दे सकता। भीष्म पितामह, जो धर्म के परम ज्ञाता और साक्षात् वसुओं के अवतार थे, उन्होंने मोह के वशीभूत होकर शास्त्र-मर्यादा का तनिक भी उल्लंघन नहीं किया। उन्होंने अत्यन्त विनम्रता किन्तु दृढ़ता से पिता के हाथ की उपेक्षा करते हुए, शास्त्रोक्त विधि का ही पालन किया और विष्णुपद वेदी पर ही पिण्ड स्थापित किया ।
भीष्म की इस अचल धर्म-निष्ठा को देखकर महाराज शान्तनु और अन्य पितृगण अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने स्वप्न में या साक्षात् प्रकट होकर भीष्म को अमोघ आशीर्वाद दिया: "बेटा, हम तुम्हारे शास्त्रीय ज्ञान से बहुत प्रसन्न हैं क्योंकि उसके कारण तुम मोहवश धर्म से भ्रष्ट नहीं हुए। तुमने शास्त्र का प्रमाण मानकर धर्म, शास्त्र, वेद, ऋषिगण और ब्रह्मा का मान बढ़ाया है तथा जो धर्म में स्थित हैं उन्हें अपना आदर्श दिखाकर विचलित नहीं होने दिया।" तत्पश्चात् पितरों ने भीष्म से स्वर्ण दान करने को कहा, जिससे उनके पूर्व की पीढ़ियों का भी उद्धार हो गया ।
भगवान श्रीराम का रुद्रपद पर दृष्टान्त: इसी के समतुल्य एक अन्य दृष्टान्त स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का है। जब वे वनवास के दौरान गया में रुद्रपद पर महाराज दशरथ का पिण्डदान (षष्ठी या सप्तमी तिथि के आस-पास) कर रहे थे, तब स्वर्ग से महाराज दशरथ ने भी अपना हाथ फैला दिया था । किन्तु श्रीराम ने भी शास्त्र के अतिक्रमण के भय से पिता के हाथ में पिण्ड न देकर रुद्रपद पर ही विधिपूर्वक स्थापित किया। इस कृत्य पर महाराज दशरथ अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा, "हे पुत्र तुमने मुझे तार दिया, अब मैं तुम्हारे इस शास्त्र-सम्मत कर्म के कारण रुद्र लोक को प्राप्त करूँगा।" ।
इन दोनों प्रसंगों का सबसे गहन धर्मशास्त्रीय निष्कर्ष यह है कि षष्ठी श्राद्ध या किसी भी पार्वण श्राद्ध में शास्त्र की विधि और मन्त्रों का महत्त्व मानवीय और लौकिक भावनाओं से कहीं अधिक है। नियम का अतिक्रमण पितरों को अवनति की ओर ले जाता है, जबकि भावनाओं पर नियन्त्रण कर शास्त्र सम्मत आचरण करना ही उन्हें मोक्ष प्रदान करता है।
श्रीमद्भागवत पुराण, गीता और षष्ठी श्राद्ध का दार्शनिक सम्बन्ध
श्राद्ध के इस विधान में पुराणों का मत केवल कर्मकाण्ड तक सीमित नहीं है, अपितु यह आध्यात्मिक ज्ञान से भी जुड़ा है। मान्यता है कि पितृपक्ष की षष्ठी तिथि के श्राद्ध में यदि ब्राह्मण भोजन के समय या पिण्डदान के पश्चात् श्रीमद्भागवत गीता के छठे अध्याय (आत्मसंयम योग) का पाठ किया जाए, तो इससे बड़े-से-बड़े पितृदोष समाप्त हो जाते हैं । गीता का छठा अध्याय मन के नियन्त्रण और आत्मा की ऊर्ध्व गति का मार्ग प्रशस्त करता है। गरुड़ पुराण के अनुसार जो मनुष्य इस महापुराण और गीता का पाठ श्राद्ध के दिन करता है, वह निष्पाप होकर यमराज की भयंकर यातनाओं को तोड़कर स्वर्ग को प्राप्त करता है और उसके पूर्वज तत्काल मुक्त हो जाते हैं ।
उपसंहार (निष्कर्ष)
समस्त प्रामाणिक धर्मशास्त्रों— याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति, गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण एवं स्कन्द पुराण— के विशद और सूक्ष्म विश्लेषण से यह पूर्णतः सिद्ध होता है कि "षष्ठी श्राद्ध" पितृपक्ष का एक परम कल्याणकारी, जटिल और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान है।
- 1. शास्त्रीय बाध्यता और तिथि निर्णय: जिनकी मृत्यु वर्ष के किसी भी पक्ष की षष्ठी तिथि को हुई हो, उनके वंशजों के लिए आश्विन कृष्ण षष्ठी को श्राद्ध करना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, मातृकाओं और स्कन्द भगवान की कृपा प्राप्ति हेतु भी इस तिथि का उपयोग पूर्णतः शास्त्रसम्मत है।
- 2. अकाल व बाल मृत्यु का स्पष्ट निषेध: अकाल मृत्यु (दुर्घटना, आत्महत्या आदि) प्राप्त जीवों का श्राद्ध षष्ठी को किसी भी परिस्थिति में नहीं होना चाहिए, उनके लिए केवल चतुर्दशी तिथि ही निर्धारित है। बाल्यावस्था में मृत संतानों के लिए उनके संस्कारों (उपनयन आदि) के आधार पर ही इस दिन श्राद्ध का निर्णय लिया जाना चाहिए; उपनयन से पूर्व बालकों का पूर्ण पार्वण श्राद्ध षष्ठी को वर्जित है।
- 3. विशिष्ट फल की प्राप्ति: याज्ञवल्क्य स्मृति के अकाट्य प्रमाण के अनुसार इस दिन श्राद्ध करने वाले को समाज और समस्त लोकों में 'पूज्यता' (सम्मान व कीर्ति) प्राप्त होती है। यह तिथि रोगों के शमन और कुल में वर्चस्व स्थापित करने के लिए भी अमोघ है।
- 4. विधि की प्रधानता: भीष्म पितामह और भगवान राम के गया-श्राद्ध के दृष्टान्त यह उद्घोष करते हैं कि श्राद्ध कर्म में भावनाओं की अपेक्षा 'शास्त्रोक्त विधि' (कुतप मुहूर्त, सुपात्र ब्राह्मण का चयन, पञ्चबलि का सिद्धान्त और कुशा का प्रयोग) सर्वोपरि है।
अतएव, प्रत्येक सनातन धर्मी का यह परम कर्त्तव्य है कि वह पितृ-ऋण से उऋण होने के लिए, अपनी वंश-वृद्धि के लिए, और अपने पूर्वजों के पारलौकिक पाथेय की सुचारु व्यवस्था के लिए षष्ठी श्राद्ध को पूर्ण श्रद्धा, पवित्रता और शास्त्र-सम्मत विधि से सम्पन्न करे। श्रद्धया दीयते यस्मात् तत् श्राद्धम्— जहाँ अगाध श्रद्धा और प्रामाणिक शास्त्र का संगम होता है, वहीं पितृदेव पूर्णतः सन्तुष्ट होकर अपने वंशजों पर अमोघ आशीर्वाद की अनन्त वर्षा करते हैं।


